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किस क़द्र सादा हैं हम

किस  क़द्र  सादा  हैं  हम,  कैसी  क़ज़ाएं  माँगेंदुश्मनों  से   भी   मुहब्बत   की  अदाएं  माँगेंहाल यह है कि हुआ पल का गुज़रना भी मुहालकितने  ख़ुशफहम  हैं,  जीने  की 
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एक ग़ज़ल

बूँद  पानी  की  हूँ  थोड़ी  सी  हवा  है  मुझ मेंउस बिज़ाआत पे भी क्या ज़रफ़ा इना है मुझ मेंये  जो  एक  हश्‍र  शबो  रोज़  बपा  है  मुझ मेंहो न हो  कुछ  और  भी 
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दिल की दिल में

दिल की दिल में न रह जाये यह कहानी कह लोचाहे  दो  हर्फ़  लिखो  चाहे  ज़बानी  कह  लोमैंने  मरने  की  दुआ  मांगी थी  वो पूरी न हुईबस  इसको  मेरे  जीने  की  कहानी  कह
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कितने मौसम बीत गये हैं

कितने मौसम बीत गये हैं  दुख सुख की तन्हाई मेंदर्द की  झील नहीं सूखी  है  आँखों की अंगनाई मेंबीती  रातों  के झोंके  आए जब मेरी  अंगनाई मेंदिल  के  सौ  सौ  टांके टूटे  एक एक 
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एक शायर

रात भर एक जिस्म था जिस पर कई ख़न्जर चलेदिन निकल आया तो हर सिम्त से पत्थर चलेअपने सब मंज़र लुटा कर शाम रुख़्सत हो गईतुम भी वापस लौट जाओ हम भी अपने घर चलेनींद की सारी तन्नाबें टूट कर गिरती गईंमुझ को तन्हा छोड़ कर ख़्वाबों के सब पैकर चलेक़र्ब जब तख़लीक का हद से
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दुनिया सजी हुई है

दुनिया   सजी  हुई  है   बाज़ार   की तरहहम  भी  चलेंगे  आज  ख़रीदार  की तरहटूटे  हों  या  पुराने हों  अपने तो  हैं यहीख़्वाबों को जमा करता हूं आसार  की
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जीना है कैसे मुझको

जीना है कैसे  मुझको तन्हा  न  फैसला करख़ुशियों से राय ले ले ग़म से भी मशवरा करदुनिया की भीड़ में मैं गुम हो के रह गया हूंऎ  आईने  मुझे  तू  माज़ी   ज़रा अता करथक कर न बैठ जाना राहों में ऎ मुसाफिरमंज़िल तुझे मिलेगी
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एक ग़ज़ल

मेरी ज़ुबां से मेरी दास्तां सुनो तो सहीयकीं करो न करो मेहरबां सुनो तो सहीचलो ये माना कि मुजरिमे मुहब्बत हैंहमारे जुर्म का हमसे बयां सुनो तो सहीबनोगे मेरे दोस्त तुम, दुश्मनों एक दिनमेरे हयात की आबो गुहा सुनो तो सहीलबों को  सी के जो बैठे हैं महफ़िल
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एक शायर

सफ़र    की   दर्द   भरी दास्तान रख दूंगामैं पत्थरों पे लहू का निशान रख दूंगाये आग शहर की गर मैं बुझा न पाया तोदहकते    शोलों   पे अपना मकान रख दूंगा तुझे   ज़मीन  
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एक शायर

कहीं ऎसा न हो दामन जला लोहमारे आंसुऔं पर ख़ाक डालो मनाना ही ज़रूरी है तो फिर तुमहमें सबसे ख़फ़ा हो कर मना लो बहुत रोई हुई लगती हैं आंखें मेरी ख़ातिर ज़रा काजल लगा लो अकेलेपन से खौ़फ आता है मुझकोकहां हो ऎ मेरे ख़ाबों - ख़यालों बहुत मायूस बैठा हूं मैं तुमसे कभी