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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (६) : एक मकड़ा और मक्खी

इक दिन किसी मक्खी से यह कहने लगा मकड़ा इस राह से होता है गुजर रोज तुम्हारा लेकिन मेरी कुटिया की न जगी कभी किस्मत भूले से कभी तुमने यहां पाँव न रखा गैरों से न मिली तो कोई बात नहीं है अपनों से मगर चाहिए यूं खिंच के न रहना आओ जो मेरे घर में , तो इज्जत है यह
 
अफ़लातून