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तुम ही बताओ...अब इस चाय को कौन पीयेगा ?

प्यारी गुड्डू की माँ !ख़ुश रहो !ऐसा कह कह कर मैं शब्दों का अपव्यय नहीं करना चाहता क्योंकि मैं जानता हूँ तुम आलरेडी ख़ुश हो और आलवेज़ ख़ुश हीरहना चाहती हो । न केवल तुम ख़ुश रहना चाहती हो, बल्कि मुझे भीख़ुश ही देखना चाहती हो इसलिए 15 दिन के लिए मुझे घर
 
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नारी के साथ इतना उपेक्षापूर्ण व्यवहार क्यों ?

हे भगवान् !आप ने ऐसा क्यों किया ?नारी के साथ इतना उपेक्षापूर्ण व्यवहार क्यों किया ?पुरूष के लिए तो तुमनेस्वर्ग में सोमरस और नर्तकियों की टनाटन व्यवस्थाकर दीलेकिन नारी के लिए क्या ?नारी भी क्या नारी का ही डांस देखे ?क्या मज़ा आएगा ?ऐसी व्यवस्था में तो
 
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मिथिलेश भाई ! भैंस के आगे बीन बजाने से कुछ नहीं होगा, बीन से भैंस को बजाने का जुगाड़ कीजिये....

बहुत दिनों बाद, आज कुछ बांचने का समय मिला तो जो कुछपढ़ने को मिला, वह नि:सन्देह दुखी कर गया ।भेड़ों और भेड़ियों के बीच अन्तर करना मुश्किल हो गया है .........भाई मिथिलेश को व्यथित देख मैंने पता लगाया कि बात शुरूकहाँ से हुई तो ये फूटी कौड़ी का रहस्य उजागर हुआ
 
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बिल्ली की नज़र सदा सूगले छीछ्ड़े पर ही क्यों रहती है ? कौवा मुँह खोलते ही गन्दगी में ही क्यों चोंच मारता है ?

भगवान् की बनायी इस विचित्र रचना में बिल्लियों की नज़र सड़े हुए सूगले छिछड़े पर हीक्यों रहती है ? और कौवा जब भी मुँह खोलता है तोगन्दगी में ही क्यों चोंच मारता है ?इसका जवाब तो इस रचना को बनाने वालारचनाकार ही दे सकता हैमैं तो केवल ये सोच कर हैरान हूँ कि
 
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ज़माना ही ऐसा है, जिसका दिखता है, उसीका बिकता है...........

संयोग से आज सब्ज़ी बाज़ार में जाना हुआ। क्योंकि एक फ़िल्मके लिए सब्ज़ी बेचने वाली का आयटम सोंग लिखने का काममिला है और मैं इसे एकदम रापचिक यानी गुनगुनी यानी ठेठमांसल भाषा में लिखने के मूड में था लिहाज़ा मैं बाज़ार का मुआयना कर रहा था तो एक मज़ेदार वाकिया
 
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नापसन्दवादियों ! लगे हाथ ये भी कर डालो, आपको लंगड़े तीत्तर को कुकुरमुत्ता खिलाने का पुण्य प्राप्त होगा

प्यारे नापसन्दवादियों !सादर प्रणाम ।जब आप इतनी मेहनत कर रहे हो मेरे आलेख पर नापसन्दीचटके लगाने के लिए तो लगे हाथ एक काम और कर डालो, आपको लंगड़े तीत्तर को कुकुरमुत्ता खिलाने का पुण्य प्राप्त होगा ।वो क्या है कि मेरे इस ब्लॉग के खाते में पिछले दो माह से
 
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ब्लोगवाणी पर आज नापसन्द का इतिहास रचेगा अलबेला खत्री का नन्हा सा आलेख क्योंकि सच सच लिखा है न !

ब्लोगवाणी पर आज नापसन्द का इतिहास रचेगा अलबेला खत्रीका वह नन्हा सा आलेख जो मैंने इस पोस्ट के पहले लिखा था ।लेकिन मुझे कोई तकलीफ़ नहीं होगी क्योंकि सच तो लोगों नेस्वामी दयानंद का नहीं झेला, तो फिर अलबेला खत्री क्या चीज़ है ?पसन्द करो या नापसन्द करो, इसकी
 
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रवि रतलामी जी ! किस बात के लिए मिले पद्म पुरस्कार ? दिया ही क्या है आपके स्वनामधन्य साहित्यकार ने ?

एक पद्म पुरस्कार जो मुझे मिलते-मिलते रह गया!posted by raviratlami@gmail.com (Raviratlami) at छींटें और बौछारें - 6 hours ago [image: image] जैसे ही मुझे पता चला कि मेरा नाम भी इस वर्ष दिए जाने वाले पद्म पुरस्कारों की सूची में है, मेरे पैरों तले धरती खिसक
 
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हो सकता है सूरत की जेल में बन्द कोई कैदी निर्दोष हो, लेकिन जेलर तो पूर्णतः दोषी हैं

जी हाँ ! ये सच है कि सूरत की जेल के जेलर दोषी हैं .सूरत की सब जेल में हज़ारों कैदी हैं और उन कैदियों पर जेल मेंजिनकी हुकूमत चलती है वे वहाँ के जेलर हैं । जेलर का सरनेमदोषी है इसलिए जब मैंने उनसे कहा कि जेलर साहेब, हो सकता हैआपकी जेल में बन्द कोई कैदी
 
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बी एस पाबला जी को कोसने वालों पर कृपा करो सरस्वती माँ ! उन्हें व्यावहारिकता का थोड़ा ज्ञान दो माँ......

कल ब्लोगवाणी में मित्रों के आलेख और टिप्पणियां पढ़ते - पढ़तेबाबा समीरानंद के रास्ते, रचना की एक टिप्पणी के ज़रिये मैं"मसिजीवी" पर पहुँच गया जहाँ "चिट्ठाचर्चा" के स्वामित्व कोलेकर हंगामा मचा था और लोग पानी पी पी कर बी एस पाबला को इसलिए कोस रहे थे क्योंकि
 
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कमबख्त टिप्पणी इत्ती लम्बी हो गई कि पोस्ट बन गई, मुझको अवधियाजी मुआफ करना, गलती म्हारे सै होगई

सम्मान ?"सम्मन" के युग में सम्मान ? वो भी लेखकों को ? कौन बेवकूफ़ देरहा है भाई ? ज़रा उसका लिंक तो दो...और हाँ ! ये लिंक ठीक से टाइप तो हो गया न ? नहीं तो फिर नया लफड़ा शुरू हो जाएगा । हाँ, तो मैं कह रहा था कि सम्मान ...वो भी लेखकों को ? क्यों भाई !क्या
 
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संगीता पुरी जी ! "वत्स" जी ! कृपया बताइये.....क्या यह एक संयोगमात्र हैं या कोई दैवीय चमत्कार ....?

सम्मान्य संगीता पुरी जी , पंडित डी के शर्मा 'वत्स' जी तथा सभी मित्रो ! नमस्कार । कुछ जिज्ञासाएं हैं जिनके बारे में सार्वजनिक रूप से पूछ रहा हूँ ताकि अन्य मित्रों को भी अगर ऐसा ही कुछ जानना हो , तो उन्हें भी ख़बर हो सके । # गत कई दिनों से लगातार अनुभव
 
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हे रचनाजी ! हे पाबलाजी ! आप दोनों के कारण जो पैदा हुई है मेरे मन की उस जिज्ञासा को भी शान्त करो प्लीज़....

अभी अभी बी एस पाबला जी के ब्लॉग पर मुझे यह माल पड़ा मिल गया । मैं चुपके से बिना किसी को बताये ये उड़ा लाया । क्योंकि मुझे ये माल मेरे काम का लगा । हालांकि भारतीय संस्कृति में सन्त लोग काम को मनुष्य का शत्रु मानते हैं लेकिन मेरे प्रिय फिल्मी गीतकार आनन्
 
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