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एक अंतर्कथा

अग्नि के काष्ठखोजती माँ,बीनती नित्य सूखे डंठलसूखी टहनी, रुखी डालेंघूमती सभ्यता के जंगलवह मेरी माँखोजती अग्नि के अधिष्ठानमुझमें दुविधा,पर, माँ की आज्ञा से समिधाएकत्र कर रहा हूँमैं हर टहनी में डंठल मेंएक-एक स्वप्न देखता हुआपहचान रहा प्रत्येकजतन से जमा
 
रंगनाथ सिंह