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मदर्स-डे पर मेरे उपन्यास ‘बूढ़ी डायरी’ का एक अंश

Share बाबूजी के चले जाने के बाद हवेली का मौन सहन करना असम्भव हो गया था।हमारी हवेली में उदासी का साम्राज्य स्थापित हो गया और हमारे बीच भी मौन आकर ठहर गया।        लेकिन हर बार की तरह तुमने एक दिन मौन को हरा ही
 
माणिक
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उपन्यास ‘को अहम्’ का कथा सूत्र

Shareयदि नर्मदा तट पर मुझे सदानंद नहीं मिलता तो संभवतः इस कथा का जन्म ही नहीं होता सदानंद ने ही मुझसे कहा था-‘‘नर्मदा का नदी होना या शिव पुत्री होना एक ही बात है क्योंकि नर्मदा जब शिव पुत्री है तो शिव का विस्तार है और नर्मदा जब नदी है तो शिवत्त्व का
 
माणिक
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यशवन्त कोठारी का रूमानी उपन्यास – ‘वसन्त सेना’ पढ़ें ई-बुक के रूप में

यशवन्त कोठारी का रूमानी उपन्यास – वसन्त सेना पढ़ें यहीं पर स्क्रिब्ड ई-बुक के रूप में. बड़े आकार में पढ़ने के लिए फुलस्क्रीन कड़ी पर चटका लगाएँ. डाउनलोड कर पीडीएफ़ ईबुक के रूप में पढ़ने हेतु नीचे दी गई कड़ी पर चटका लगाएँ. Vasant Sena Novel by Yashwant
 
Raviratlami
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दंश – आठवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास शायद गलत कहा मैंने. गलतफहमियां पूरे-पूरे परिवार निगल जाती हैं, संभलने का कोई मौका दिए बिना. चोर के पकड़े जाने का समाचार अखबार में छपा. दरोगा के फोटो के साथ. खबर मिलते ही बड़ा दरोगा थाने आ धमका. बापू का अंगूठा लगा बयान पढ़कर उसने नए
 
kashyap omprakash
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दंश —सातवीं किश्त

धारावाहिक उपन्यास मां ने पूरी रात जैसे कांटों पर चलकर बिताई थी. दिन ऊबड़-खाबड़ पथरीले जंगल में नंगे पांव भटकने जैसा था. सुबह हुई. मगर हमारे लिए तो आने वाला दिन भी अंधेरा था. काला….गहरा….डरावना और घोर नाउम्मीदियों से भरा हुआ. जिसकी कोई मंजिल न
 
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चन्दावती (धारावाहिक उपन्यास)

पहली किस्त:दादा केरि तेरही तेरह बाँभन आय गे रहै। उनका अलग चउका लगावा गा रहै, नई तेरह धोती-अँगउछा-जनेऊ-थरिया-लोटिया-नए पाटा,तेरह तुलसी बाबा वाली रामायन के गुटका अउरु तेरह संख बजार ते मँगवाये गे रहै। आस पास कि जवार ते चुने भये तेरह बाँभन नेउते गे रहै। उनकी
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दंश — छ्ठी किश्त

धारावाहिक उपन्यास बापू के स्वभाव को लेकर अनेक विचार मेरे दिमाग में आते. प्रायः हर विचार में वह मुझे खलनायक के रूप में दिखाई पड़ता. मन में उसके प्रति घृणा-नफरत जैसा न जाने क्या-क्या चलता रहता. परंतु मां का बापू के प्रति समर्पण मुझे उसके विरुद्ध मुंह खोलने
 
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दंश – चौथी किश्त

धारावाहिक उपन्यास इस प्रकार मेरा नामकरण बापूधाम की परंपरा के अनुसार ही हुआ. मैं परमात्मा सेन कहलाने लगा. इस नामकरण की सूचना परमात्माशरण को कई वर्ष बाद मिली. तो भी वह बहुत प्रसन्न हुआ. चुनाव हारने का जो गम था, वह इस घटना के बाद काफी कम हो गया. अपनी खुशी
 
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दंश – तीसरी किश्त

धारावाहिक उपन्यास आज बापूधाम को बसे वर्षों बीत चुके हैं. विधवा की मामूली झोंपड़ी से महानगर का सबसे बड़ा वोट उत्पादक क्षेत्र बनने की, बापूधाम की कथा बेहद रोमांचक है. मगर कितने लोग हैं जो इस हकीकत से परिचित हैं. सिवाय बस्ती के दो-चार बूढ़ों या सीलन और दीमक
 
kashyap omprakash
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दंश—धारावाहिक उपन्यास

दूसरी किश्त नमस्ते, बाबू साहेब! हुजूर! मैं परमात्मा सेन उर्फ परमात्मा शरण वल्द घुरिया, उर्फ घनश्याम आपको अपनी आपबीती सुनाना चाहता हूं—सुनिएगा न! सिरीमान! कहानी शुरू करूं उससे पहले आपसे एक गुजारिश है. जरा धीरज बनाए रखिएगा. क्योंकि बात जरा लंबी है. हां
 
kashyap omprakash
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71 साल (भाग-7)

साल (भाग-7) रामनेऱश अपने भाई के पास जा कर बैठ गए... भाई लेटा रहा वो उनके सिरहाने बैठे रहे..दोनो में काफी देर तक कोई बात नहीं हुई... फिर कुछ देर बाद भाई की पत्नी नीता रामनरेश के लिए चाय ले आई... चाय रखते हुए बोली भाभी-भई वो मना कर गए.... रामनरेश-मना क
 
shan
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अनुवादक की बात [चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा की भूमिका] - सूरज प्रकाश और के.पी.तिवारी

महान प्रकृतिविज्ञानी चार्ल्स राबर्ट डार्विन (१२ फरवरी, १८०९- १९ अप्रैल, १८८२) को प्रजातियों के विकास की नई अवधारणाओं के जनक के रूप में जाना जाता है। वे आधुनिक विज्ञान के भी जनक हैं। सबसे पहले उन्होंने ही ये सिद्धांत दिया था कि प्रजातियों का उद्भव विक
 
साहित्य-शिल्पी
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अनुवादक की बात [चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा की भूमिका] - सूरज प्रकाश और के.पी.तिवारी

महान प्रकृतिविज्ञानी चार्ल्स राबर्ट डार्विन (१२ फरवरी, १८०९- १९ अप्रैल, १८८२) को प्रजातियों के विकास की नई अवधारणाओं के जनक के रूप में जाना जाता है। वे आधुनिक विज्ञान के भी जनक हैं। सबसे पहले उन्होंने ही ये सिद्धांत दिया था कि प्रजातियों का उद्भव विक
 
साहित्य-शिल्पी
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''गुनाहों का देवता'' में ऐसा क्या ?

बहुत दिनों से भाषा विज्ञान से कुछ अलग पढने का मन था, पीएच। डी का विषय भाषाविज्ञान होने के कारण अधिकतर इसी में उलझ कर रह जाती हूँ पर पिछले ही हफ्ते जब मै अपने दोस्तों के साथ बैठ कर किसी विषय पर कुछ बात कर रही थी, तो बात आगे बढ़ते -बढ़ते ''गुनाहों का द
 
प्रतिमा
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विभाजन के समय मारे गए हज़ारों हिन्दुओं का पिंडदान और तर्पण : तेभ्य: स्वधा

चीड़ वन के आहत मौन को समर्पित, प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.नीरजा माधव का उपन्यास "तेभ्य:स्वधा" कश्मीर की राजौरी घाटी के शरणार्थी शिविरों में बसे उन हज़ारों अनाम हिन्दुओं को श्रद्धांजलि है जो भारत-विभाजन के समय पाकिस्तान से विस्थापित हुए और बर्बरतापूर्वक मारे
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आत्मा तक चित्कार उठती है

आजकल बारिशों का मौसम हैं। पूरा दिन टपकता रहता है, बारिश की वजह से कही बाहर जाना नही हो पा रहा था। शाम में पापूलर भाई आ गए थे, वो 30 जुलाई में एक प्रोग्राम करने जा रहे है, कुछ लोगों को कार्ड देने थे, मैं चल पड़ा। बारिशमें भीगते-बचते हम निकल पड़े, साथ में
 
इरशाद अली
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उपन्यास की प्रासंगिकता और सरोकार

सर विद्याधर सूरज नायपाल की प्रतिष्ठा विदेशों में चाहे जिसके लिए हो परंतु भारत में उनकी चर्चा प्रायः उनके विवादित बयानों के कारण ही होती है. शायद इसलिए कि अपने साहित्य के माध्यम से वे आम पाठक के मन में वैसा स्थान नहीं बना पाए हैं जो किसी नोबल पुरस्कार
 
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यशवन्त कोठारी का उपन्यास : नया सवेरा – अंतिम किश्त

नया सवेरा यशवन्त कोठारी (पिछले अंक से जारी…) अन्‍ना के पास बहुत सा समय खाली रहता। करने को कुछ विशेष नहीं था। ऐसे में वो स्‍वयं में खो जाती। कुछ न कुछ सोचती रहती। कमरे में अकेली बैठी प्रवासी जीवन पर सोचने समझने के प्रयास करती। अन्‍ना ग्रामीण जीवन में
 
Raviratlami
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यशवन्त कोठारी का उपन्यास : नया सवेरा - 6

नया सवेरा यशवन्त कोठारी   (पिछले अंक से जारी…) पन्‍द्रह अगस्‍त उन्‍नीस सौ सत्‍ताणवें आजादी का पचासवां स्‍वतन्‍त्रता दिवस का पावन पर्व। आज पूरे कस्‍बे में अपूर्व उत्‍साह, उल्‍लास और उमंग थी। सर्वत्र खुशी, उमंग, चैन लेकिन कहीं कहीं लोगों के दिलों
 
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यशवन्त कोठारी का उपन्यास : नया सवेरा - 4

किशोर उपन्यास नया सवेरा यशवन्त कोठारी (पिछले अंक से जारी…) अभिमन्‍यु और कमला जब गांव पहुंचे तो रात गहरा चुकी थी। गाँव सुनसान और नीरव था, अपने घर तक पहुँचने में अभिमन्‍यु ने शीघ्रता बरती। घर के बाहर ही उसे अकबर मिल गया। ‘‘ कैसे हैं बाबूजी। '' अभिमन्‍य
 
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यशवन्त कोठारी का उपन्यास : नया सवेरा 3

किशोर उपन्यास नया सवेरा यशवन्त कोठारी (पिछले अंक से जारी…)   अन्‍ना और मिसेज प्रतिभा साथ रहने लग गयी थी। अन्‍ना दिनभर कस्‍बे तथा आसपास के छोटे गांवों में जाकर महिलाओं ओर बच्‍चों की स्‍थिति पर सर्वेक्षण करने लगी। उसने महसूस किया कि गांवों में लड़
 
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ओमप्रकाश कश्यप का बाल उपन्यास : मिश्री का पहाड़ (अंतिम किश्त)

मां, गांधी जी भी तो अकेले ही थे.' टोपीलाल ने मां की बात काटी. हालांकि ऐसा वह कम ही करता था. ‘वो जमाना और था बेटा, तब का आदमी इतना काईंयां नहीं था कि पीठ पीछे से वार करे...' ‘तू बेकार ही परेशान हो रही है. बच्‍चों से कोई क्‍या दुश्‍मनी निकालेगा.' ‘तू अ
 
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ओमप्रकाश कश्यप का बाल उपन्यास : मिश्री का पहाड़ (4)

अरे, यह क्‍या हुआ! छींक के साथ बालों की पूरी एक बस्‍ती धराशायी हो चुकी थी. दूसरी छींक आई तो वह दूसरे मुहल्‍ले को ले उड़ी. इसके बाद तो छींकों के आने और केश-कुंजों के उजड़ने का सिलसिला चलता ही गया. मैंने सोचा कि गीले तौलिये से छींक आती है, तो क्‍यों न
 
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ओमप्रकाश कश्यप का बाल उपन्यास : मिश्री का पहाड़ (2)

मिश्री का पहाड़ (बालउपन्‍यास) ओमप्रकाश कश्‍यप BPSN PUBLICATION G-571, ABHIDHA, GOVINDPURAM GHAZIABAD, UP-201013 --- सर्वाधिकार : लेखक मूल्‍य : 175 रुपये प्रथम संस्‍करण : 2009 प्रकाशक : बीपीएसएन पब्लिकेशन जी-571, गोविंदपुरम्‌, गाजियाबाद-201013 आवरण सं
 
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ओमप्रकाश कश्यप का बाल उपन्यास : मिश्री का पहाड़

मिश्री का पहाड़ (बालउपन्‍यास) ओमप्रकाश कश्‍यप BPSN PUBLICATION G-571, ABHIDHA, GOVINDPURAM GHAZIABAD, UP-201013 --- सर्वाधिकार : लेखक मूल्‍य : 175 रुपये प्रथम संस्‍करण : 2009 प्रकाशक : बीपीएसएन पब्लिकेशन जी-571, गोविंदपुरम्‌, गाजियाबाद-201013 आवरण सं
 
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