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खुद-गर्ज़ जमाना ....!!!

देखो? इन्सान कितना खुद- गर्ज़ हो गया ,खून के रिश्ते निभाना भी, इक कर्ज़ हो गया । जिन्दगी भर उठाये रखा ,जिनको सीने पर ,वही अहसास -अपनों का ,मर्ज़ हो गया । आज महसूस हुई जब, जरूरत उनकी ,उनका पल भर का आना , अदा-फर्ज़ हो गया । क्यों ?बेरुखी करते है ,जमाने के
 
कमलेश वर्मा