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वे कुछ बोले, यही काफी है: डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अखबारों का क्या दोष है ? अगर डेढ़-दो घंटे की पत्रकार परिषद में आप कोई काम की बात नहीं बोलेंगे तो वही होगा, जो आज अखबारों ने किया है| अगर आप खबर नहीं देंगे तो वे अ-खबर को खबर बनाएंगे| इसीलिए लगभग हर अखबार ने प्रधानमंत्री की पत्र्कार परिषद पर यही
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दंगा-राहत

मंजीत ने अपना वादा पूरा किया था। आज उसकी चिट्ठी मिलने से पुनीता के उदास चेहरे पर ख़ुशी लौट आयी थी. ममी लॉन में कुर्सी डाल कर बैठी स्वेटर बुन रही थीं. साथ ही सोच रही थीं कि सहेली का पत्र मिलते ही पुनीता कैसे उड़ान भरते पक्षी की तरह उत्साह से भर गयी है,
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वाकई वो बहुत दुखद समय था...

मेरे घर के बराबर में एक छोटी सी पार्कनुमा जगह है जहाँ अक्सर अंकल जी टाइप कुछ लोग बैठे मिलते है वो अक्सर समसामयिक मुद्दों पर बात करने के लिए लालायित रहते हैं और अगर उन्हें कोई ऐसा बन्दा मिल जाए जो थोड़ा बहुत पढ़-लिख रहा हो और उनके पास कम बैठता हो तो व
 
तरुण गुप्ता