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एक सुबह को छू कर देखा......

गुलामी किसी नासूर की तरह होती है. ये दर्द वही समझ सकता है जिसने इसका दर्द सहा हो. जिल्लतों और वहशतों का वो दर्दनाक दौर जो हम ने सौ साल तक झेला है, उसका अहसास हमारी नस्लों को हमेशा याद रहेगा और रहना भी चाहिए. इसीलिए १५ अगस्त की ये मुबारक सुबह जब तुलू
 
rakhshanda