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तेरी आहट

ज़ख्म मुस्कुराते हैं अब भी तेरी आहट पर,दर्द भूल जाते हैं अब भी तेरी आहट पर । शबनमी सितारौं पर फूल खिलने लगते हैं,चाँद मुस्कुराता है अब भी तेरी आहट पर । उमर काट दी लेकिन बचपना नहीँ जाता,हम दिए जलाते हैं अब भी तेरी आहट पर ।तेरी याद आए तो नींद जाती रहती
 
गजेन्द्र बिष्ट
टैग: आहट
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"...मुझमे तुम कितनी हो..?''

"...मुझमे तुम कितनी हो..?''  हर आहट, वो सरसराहट लगती है,  जैसे डाल गया हो डाकिया; चिट्ठी   दरवाजे के नीचे से.  अब, हर आहट निराश करती है.  हर महीने टुकड़ों में मिलने आती रही तुम देती दस्तक सरसराहटों से .  सारी
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
टैग: आहट