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आवाज का निराला अंदाज (अविनाश वाचस्‍पति)

आवाज का साम्राज्‍य बढ़ रहा हैजिससे ध्‍वनि प्रदूषण बढ़ रहा हैबढ़त और चढ़त प्रत्‍येक शै की हो रही हैगिर रहे हैं संस्‍कार और मूल्‍यउससे भी अधिक तेजी से।आवाज ही आवाज है चारों ओर कुछ गिरता है तो आवाज होती हैजहाज उड़ता है तो ...उससे पहले स्‍टार्ट करें कुछ भीतो
 
अविनाश वाचस्पति
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एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे

जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती हैवहीँ मैं हो गया हूँ खड़ाइस उम्मीद में किआज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगाअब जबकि सारी दुनिया ओट हो चुकी हैआवाज खींच के तुमने जो तानी है, उससेमैं बेसब्र हो रहा हूँ किकितनी जल्दी तुम झुक जाओ तानपुरे पेमुझे धुन देने के
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तेरी आवाज में मेरा नाम!

बियाबान मौन का है और ये बंजारा जिस्म, मेरा और एक भटकाव है उस मौन में जो ख़त्म हीं नहीं होता आँखे तेरी गुम हो गयी आवाज के निशाँ ढूँढती है वक्त खानाबदोश हो गया है रोज डेरा बदल लेता है गाड़ देता है तम्बू , जहाँ भी कोई आहट , धुंधली सी भी आहट सुनाई दे जात
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