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कॉरपोरेट नेतृत्व में लोकतंत्र : विकास या विकास का आतंकवाद?

14 मई 2010 को पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के संघर्षरत साथियों पर धिनकिया ग्राम में गोलीचालन, की घटना हुई। 12 मई 2010 को कलिंग नगर में गोलीचालन, नियमगिरि एवं पोटका, झारखण्ड में दमनकारी कार्रवाई हुई। इसके खिलाफ जननेत्री दयामनी बरला के नेतृत्व में झारखण्ड
 
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बरबादी की वही पुरानी दास्तान: नहर का पानी खा गया खेती

रायबरेली से लौट कर रेयाज उल हक अपनी फूस की झोंपड़ी में गरमी से परेशान छोटेलाल बात की शुरुआत आसान हो गई खेती के जिक्र से करते हैं. वे कहते हैं, ‘पानी की अब कोई कमी नहीं रही. नहर से पानी मिल जाता है तो धान के लिए पानी की दिक्कत नहीं रहती.’पास बैठे रामसरूप
 
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कृषि संकटः आपदा के घुमड़ते बादल

बढ़ती हुई महंगाई उस आपदा का सिर्फ एक संकेत है, जिससे खेती जूझ रही है. दरअसल भारतीय कृषि क्षेत्र बुरी तरह से चरमरा रहा है. संकट से पार पाने के लिए नजरिए में बड़े बदलावों की जरूरत है. लेकिन कृषि मंत्री शरद पवार आपदा की इस आहट को सुनने के लिए तैयार नहीं.
 
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मजदूरों का बंधुआ बनना जारी है...

देवाशीष प्रसून का यह लेख कल के जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था. विकास और सामाजिक उन्नति के बेशर्म और झूठे दावों के बीच जमीन पर वास्तविक हालत क्या है, इसे प्रसून ने दिखाने की कोशिश की है.अगर भारत सरकार या देश के किसी भी राज्य सरकार से पूछा जाये कि क्या अब भी
 
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भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य

गिरीश मिश्रपहले की तरह ही इस बार चालू वित्तीय वर्ष के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति की रूपरेखा संसद के समक्ष आगामी वर्ष का बजट पेश करने के पूर्व रखी गई जिससे बजट प्रस्तावों पर सार्थक बहस हो सके. 'आर्थिक समीक्षा 2009-10' में संवृध्दि की संभावनाओं और
 
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नवउदारवादी दलदल में भारत

गिरीश मिश्रगरीबी, गांवों से शहरों और पिछड़े राज्यों से अपेक्षाकृत विकसित राज्यों की ओर पलायन, भ्रष्टाचार, अपराध, आतंकवाद, सामाजिक विषमता, क्षेत्रीय असंतुलन, मलिन बस्तियां आदि हमारे देश में अनेक दशकों से विद्यमान हैं मगर इनमें परिणामत्मक एंव गुणात्मक
 
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आर्थिक संवृध्दि का मायाजाल

गिरीश मिश्रपिछले कई हफ्तो से यह धुआंधार प्रचार चल रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्वव्यापी अति मंदी के भंवर से लगभग बाहर आ गई है। उसकी संवृध्दि रफ्तार पकड़ने लगी है और वह दिन दूर नहीं जब वह दो अंकों में हो जाएगी तथा भारत विश्व की एक महाशक्ति बन जाएगा।
 
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किसानों की आत्महत्याः एक 12 साल लंबी दारूण कथा

कुछ लोगों के लिए किसानी मुनाफे का धंधा हो सकती है, लेकिन देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए यह घाटे का सौदा बना दी गई है. न सिर्फ घाटे का सौदा, बल्कि मौत का सौदा भी. और यह सिर्फ इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि खेती से महज कुछ लोगों का मुनाफा सुनिश्चित रहे. यही
 
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बिहार और जीडीपी की असलियत

विपेंद्र जीडीपी बढ़ने के आंकड़ों को विश्वसनीय बनाने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनके हमदर्द अखबार और पत्रकार तक झूठ का सहारा आखिर क्यों ले रहे हैं ? क्या इससे चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत सही नहीं साबित होती ? हाल में एक आंकड़ा
 
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बिहार : ग्रोथ रेट को लेकर क्यों बरपा है हंगामा

13 साल की उम्र में पत्रकार बनने की चाहत जगी और उसी वक्त से अखबारों में छपने लगा। 16 साल की उम्र में मासिक पत्रिका युवा चिंतन निकाला। फिर पाक्षिक हरपक्ष का प्रकाशन शुरू किया, जो बाद में 2003 तक साप्ताहिक रूप में छपता रहा। 2004 से प्रभात खबर(रांची),
 
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देश में कुल कितने गरीब हैं?

आ र्थिक पंडितों का मानना है कि राष्ट्रीय आय में वृध्दि जिस दर से होती है कोई जरूरी नहीं कि उसी दर से देश की गरीबी घटे। लेकिन आर्थिक नियम यह भी कहते हैं कि अगर राष्ट्रीय आय में वृध्दि होती है तो इसका अंश  देश की जनता में बंटता है। बंटवारा समान हो या
 
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आर्थिक मंदी में क्या कर रहे हैं अर्थशास्त्री ?

वैश्विक आर्थिक मंदी में अर्थशास्त्र क्या कर रहा है? कौन सी हलचले हैं वहां? बता रहे हैं अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता जॉर्ज एकेरलोफ़, जो यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले में प्रोफ़ेसर हैं, और कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज
 
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कार्पोरेट कल्चर से समृद्धि लाने का पाखंड

प्रमोद भार्गवविषमता की बुनियाद पर सीना ताने खड़ा आर्थिक विकास देश की बढ़ी आबादी को लगातार खाद्य असुरक्षा के घेरे में धकेल रहा है। हाल ही में जर्मन और आयरिश की संस्थाओं ने दो अध्ययन किए हैं, जिनमें उजागर हुआ है कि 84 देशों के 'वैश्विक भूख सूचकांक' में भारत
 
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सेहत हमारी, बैंगन हमारा, उनका मुनाफा

प्रफुल्ल बिदवईभारत सरकार की आनुवंशिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति ने, परिवर्तित आनुवंशिकी वाले बैंगन (जिसे विभिन्न भारतीय भाषाओं में बंगा, बंगी और बेगुन जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है) की व्यापारिक खेती को मंजूरी दे दी है। बैंगन, जिसकी उत्पत्ति भारत में
 
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उग्र उथल-पुथल की तरफ बढ़ता बिहार

मित्रों, यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन सच है. मोहल्ला लाइव पर कुछ दिनों पहले एक पोस्ट आयी थी, जिसके लेखक के रूप में हेमंत कुमार का नाम दिया गया है. वास्तव में यह लेख हमारे साथी और प्रभात खबर में उप संपादक कुमार अनिल का है, जिनसे 'अपने ब्लॉग पर डालने' के
 
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वैश्विक आर्थिक संकट : हालात और होंगे बदतर

जल्दी ही हम वैश्विक आर्थिक मंदी को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे. अभी वर्तमान हालात के बारे में बता रहे हैं डॉ. भरत झुनझुनवाला वर्तमान में विश्व अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर में है। कुछ विश्लेषकों का मत है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था शीघ्र ही संकट से
 
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40 साल पहले ऐसा था बस्तर का माड़िया

आपरेशन ग्रीन हंट देश के जिन इलाकों में पिछले एक महीने से अधिक समय से चल रहा है, उनमें बस्तर भी है. कैसा है यह बस्तर, इसके भीतर क्या चल रहा है? अबूझमाड़ जिसे कहते हैं-वहां क्या है, हम जानने की कोशिश करेंगे इस दौरान. पहली पोस्ट, बस्तर के बारे में. डॉ.
 
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भुखमरी के विश्वविजेता गणतंत्र में आपका स्वागत है

एक विश्वविजेता क्रिकेट टीम, 52 खरबपतियों, आसमान छूते सेंसेक्स और  60 वर्ष के गणतंत्र के बावजूद देश में भूखे सोने और मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. यह दुनिया में सबसे अधिक हैं. नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताये जाने के इस दौर मे
 
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उधारी की सांस लेता विकसित विश्व

मार्टिन खरे पश्चिमी मीडिया पर्यावरण संबंधी समझौतों में हो रही देरी के लिए अकारण ही विकाशशील देशों को दोषी ठहरा रहा है। पिछले दिनों फाइनेंशियल टाइम्स ने अपने मुखपृष्ठ पर छपे लेख का शीर्षक दिया था 'भारत ने एक दशक तक उत्सर्जन में कमी से इंकार कर ग्रीन ए
 
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बच्चों के अधिकारों का ढोंग और अमेरिकी जेलें

कुछ समय पहले मंथली रिव्यू में छपे एक लम्बे लेख में बताया गया था कि दुनिया में जितने कैदी हैं, उनमें से चौथाई अमेरिकी जेलों में हैं. उनमें भी बहुसंख्या अश्वेत लोगों की है. आर्थिक संकट के बढ़ने के साथ ही जेलों में बढ़नेवाले कैदियों की संख्या में भी भरी
 
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देश की कौन सी तस्वीर है जो नक्सलवाद के इस चेहरे पर दिखाई देती है

नक्सल आन्दोलन के जनाधार, उसकी वजहों और उस पर विभिन्न पक्षों के नज़रियों के बारे में बता रहे हैं रुचिर गर्ग . छत्तीसगढ़ की जन वेबसाईट से साभार. देश के राजनैतिक नक्शे पर नक्सलवाद आज एक बड़ी ताकत के रुप में दर्ज है । इतनी बड़ी ताकत कि शासक वर्ग यह
 
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राजनीति, चीनी मिल मालिक और गन्ने की कड़वाहट

दो दिन पहले गन्ना किसानों ने जब दिल्ली में आन्दोलन किया तो अख़बारों के संपादकों को लगा कि देश अचानक मध्ययुग में धकेल दिया गया है. अराजकता, गन्दगी, हुड़दंग और जाने कैसे-कैसे शब्दों की इस आन्दोलन के सन्दर्भ में झड़ी लगा दी गई और इस सनकीपन में गन्ना किसान
 
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