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लोकतंत्र में जाति का सवाल

चन्द्रिका २०११ की जनगणना में जाति गिनाने का सवाल आरक्षण के सवाल से जुड़ा हुआ नहीं है. उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण को लेकर ५० प्रतिशत का जो मानक तैयार किया था वह ४९.५ प्रतिशत के साथ लगभग पूरा हो चुका है, लिहाजा जनगणना में अब जाति गिनवाने से जो अहम फायदा
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जाति गणना और सामाजिक न्याय का सवाल

जाति की गणना एक समतापूर्ण समाज के निर्माण में सहायक हो सकती हैअरुण माहेश्वरीभारत में वर्ण-व्यवस्था की प्राचीनता अब बहस का विशय नहीं है। वर्ण-व्यवस्था सनातन धर्म का मूलाधार रही है। इतिहासकारों ने इस विशय पर भी काफी गंभीर काम किये हैं कि वर्ण-व्यवस्था के
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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महिला आरक्षण और राजनीति के क्षेत्र में व्यभिचार

दिलीप मंडलराजनीति के क्षेत्र में महिला आरक्षण का उप-उत्पाद (बाइ प्रोडक्ट) नेताओं के यौन भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी की शक्ल में नजर आ सकता है। भारतीय राजनीति में यौन भ्रष्टाचार का पक्ष अक्सर दबा दिया जाता है, जबकि राजनीति का यह एक अभिन्न अंग रहा है। इसकी
 
Reyaz-ul-haque
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जातिगत व्यवस्था : देश के लिए खतरा

जाति के आधार पर जनगणना का कोई अर्थ ही नहीं है. हाँ, यह बात सही है कि जब मुझे विभिन्न जातियों को जाति के आधार पर विशेष सुविधा देनी है तो हमें जाति का हिसाब रखना ही होगा और इसके लिए जनगणना में जाति पूछना ही होगा. पर जाति के आधार पर आरक्षण या अन्य सुविधा
 
महेश कुमार वर्मा : Mahesh Kumar Verma
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मुलायम के ख़िलाफ़ बहू डिम्पल:हमारी भविष्यवाणी सही रही

जय श्री राम ............ | आदरणीय मित्रो, आज तो हम आप की सेवा में बस एक छोटी-सी चर्चा ही करने ही उपस्थित हुए हैं | आज से पाँच दिन पहले यानि 02 अप्रेल को अख़बारों में एक ख़बर छपी | वैसे तो यह ख़बर कई अख़बारों में छपी थी,मगर हम यहाँ 'राजस्थान पत्रिका' के
 
डॉ.कुमार गणेश 369 (DR.KUMAR GANESHE 369)
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मायावती की माला आपको बुरी क्यों लगती है?

दिलीप मंडलउत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष कुमारी मायावती की माला को लेकर राजनीति और भद्र समाज में मचा शोर अकारण है। मायावती ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो वर्तमान राजनीतिक संस्कृति और परंपराओं के विपरीत है। नेताओं को सोने चांदी
 
दिलीप मंडल
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सीटी बज गई

"अरे लल्ला कहे किताबन में मूढ़ घुसाए बैठा है तानी सिट्टी बजाये की परकत्तिस तो कर लेव" अरे राम रे पूरे गाम का बवाल मचा, जवान और बुड्ढे सभी सिट्टी बजाये में लगे है , जब से पहिलवान जी कहिन है संसद में सिट्टी बजिहें तभी से सब होंठ गोल किये घूम रहे है, जो
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महज एक बच्चे की ताली पर: एक बहस जिसका जवाब प्रभाष जी ने नहीं दिया

यह लेख प्रभाष जोशी के लेख 'काले धंधे के रक्षक' के छपने के तुरंत बाद लिखा गया था, लेकिन प्रभाष जी की जिद थी कि वे इंटरनेट पर आयी बातों का जबाव नहीं देंगे। प्रिंट में आये तभी बोलेंगे।  इसलिए इसे उस समय इंटरनेट के लिए नहीं दिया गया. जब जनसत्ता ने इसे
 
Reyaz-ul-haque
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वाह भई कल्बे छा गए तुम तो

लखनऊ के एक कोई तथाकथित काले चोगे वाले शिया लीडर कह रहे हैं कि महिलाओं का काम सिर्फ़ बच्चे पैदा करना है न कि अपना हिस्सा मांगना. इन सज्जन का नाम है कल्बे जव्वाद. कल किसी दूसरे टी.वी. चैनल पर एक साधूबाबा भी कुछ यही राम अलाप रहे थे.इन प्रस्तरयुगीन विचारधारा
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आरक्षण अभी और कई तरीकों से लागू होगा

जिस तरह से सरकार अपने खर्चे कम न करके जनता पर और बोझा डालने के लिये नये नये कर (टैक्स) लगाने के तरीके ढूंढ़ती रहता है उसी तरह से राजनैतिक पार्टियां और नेता लोग अपना वोट बैंक बनाने के लिये नये नये वर्गों को आरक्षण का रास्ता दिखाता रहते हैं। देश में जरुरत
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सूरत तो बदलनी ही चाहिए

आखिर वही हुआ, जिसकी सबको उम्मीद थी। जो सभी चाहते थे और सबसे बडी बात जो होना चाहिए था। मिल ही गया महिलाओं को आरक्षण। हालांकि अभी तो पहला और नन्हा सा कदम है। रास्ता लम्बा है। लेकिन हर सफर की शुरूआत पहले ही कदम से होती है। उम्मीद है कदम कदम यह अधिनियम भी
 
pankaj mishra
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मीठा मीठा गप्प, कड़वा कड़वा थू।................घुघूती बासूती

वाह, आरक्षण के पक्षधर अचानक उसके विरोधी हो गए! जब आरक्षण खुद को नौकरी में मिलना था तब तक उसके लिए युद्ध में डटे हुए थे। तब उसके विरोधी सामाजिक न्याय के विरोधी दिख रहे थे, अकेले मलाई खाना चाहने वाले लगते थे। तब आरक्षण समर्थक चाहते थे कि अगड़ी जाति वाले
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महिला आरक्षण विधेयक की सबसे बड़ी ग़लती.

सोचना तो सरकार को भी चाहिये कि जब, संसद व राज्यों में पहले से ही अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण है तो क्यों नहीं जनप्रतिनिधियों की समस्त संख्या में से महिला आरक्षण दिया जाता.या कहिये कि कुल सीटें 100, अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए 23, बाक़ी बची 77, तो
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महिला सशक्तिकरण और महिला आरक्षण..अब पुरूषों का रूख इनके मार्ग में बाधा पहुँचाने का नहीं वरन् उदारतापूर्ण सहयोग देने का ही होगा

महिला जागरण! महिला सशक्तिकरण----जिसके लिए चिरकाल से छिटपुट प्रयत्न होते रहे हैं। न्यायशीलता सदा से यह प्रतिपादन करती रही है कि "नर और नारी एक समान" का तथ्य ही सनातन है। जीवन एक गाडी है तो उस गाडी के दोनों पहियों को एक समान महत्व मिलना ही चाहिए। स्त्री
 
पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रतिनिधित्व में आरक्षण

महिला होने  के नाते मुझे खुशी है कि आखिरकार 14 वर्षों के बाद संसद और राज्यों की विधानसभाओं  में 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिये बिल पेश हो जायेगा। ये एक ऐतिहासिक क्षण है। इस प्रकार के आरक्षण के बाद बहुत कुछ बदलेगा। हालांकि व्यक्तिगत आधार पर
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आरक्षण ही आरक्षण है जनता का कहीं पता नहीं

एक और आरक्षण की वकालत की है एक वफ़ादार पंडित ? मिश्रा जी . ? चिन्ह इस लिए लगाया गया है क्योंकि एक ईसाई भी रेड्डी या शर्मा लिख सकता है . यह देश एक छुपे षड्यंत्र की चपेट में है . विदेशी धर्मांतरण करने वालों ने एक नया तरीका निकाला है की धर्म तो बदल लो लेकिन
 
डॉ महेश सिन्हा
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ये कैसा आरक्षण है जी ?

सुना है कि सारी गोटियां फिट करके सरकार महिला आरक्षण विधेयक ला रही है सोमवार को. चमड़े के डिजा़यनर झोले लिए चमचमाती कारों में घूमती, बड़ी बिंदियों वाली भैनजियों की चांदी कटने वाली है. खूब खबर है ये खूंटा बदल भी. शोषण खाली-पीली मर्द ही काहे
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महिला आरक्षण क्यों?

सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक पास कर दिया है और अब इसपर बहस होगी। इस विधेयक में लोक सभा व राज्य विधान सभा में महिलाओं को 33% आरक्षण की व्यवस्था है। स्थानीय निकाय के चुनाव में पहले से ही महिलाओं को आरक्षण मिला हुआ है। पर वहाँ महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों
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आरक्षण बनाम वोटों की राजनीति

आरक्षण राजनीतिज्ञों के लिए वोटों की राजनीति का एक बड़ा हिस्‍सा बनता जा रहा है इसलिए रानैतिक दल को इससे कोई पहरेज नहीं की इन आरक्षणों के चलते समाज की स्थिती क्‍या हो रही है उनके युवा और बेरोजगारों के लिए आरक्षण के क्‍या मायने हैं उन्‍हें तो बस वोटों की
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आखिर कहां गायब हो जाते हैं दलित-आदिवासी अफसर

दिलीप मंडलकुल 88 में एक भी नहीं। ये आंकड़ा है देश की शीर्ष नौकरशाही में दलित अफसरों की मौजूदगी का। देश को चलाने वाली शीर्ष नौकरशाही यानी केंद्र सरकार में सेक्रेटरी पद पर नियुक्त अफसरों की संख्या के बारे में ये आंकड़ा केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण राज्य
 
दिलीप मंडल
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जब सवाल जाति का हो तो क्या सेकुलर(?) और क्या संघी

जब वर्धा में प्रोफेसर अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश जारी किया जा रहा था, लगभग उन्हीं दिनों दूर दक्षिण में मैंगलोर यूनिवर्सिटी में भी ऐसा ही एक फैसला हो रहा था। एक यूनिवर्सिटी केंद्र सरकार की है और दूसरी यूनिवर्सिटी एक ऐसे राज्य में चल रही
 
दिलीप मंडल
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आरक्षण निति : उचित या अनुचित

मैंने अपने पिछले पोस्ट में बताया कि किस प्रकार सरकार जाति के आधार पर समाज को बाँट रही है। सरकार जाति के आधार पर आरक्षण करके देश को विकाश के ओर ले जा रही है या पतन की ओर? विचारने पर यह बात सामने आता है कि जाति के आधार पर या किसी भी आधार पर आरक्षण होने के
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जाति के आधार पर समाज को बांटने में सरकार कितनी दोषी

सोचनीय है कि एक ओर धर्म व जाति के आधार पर भेद-भाव समाप्त करने की बात कही जाती है और दूसरी ओर धर्म व जाति के आधार पर आरक्षण दिया जाता है। विचारने पर तो यही बात सामने आती है कि धर्म व जाति के आधार पर समाज को बांटने का कार्य करने में सबसे ज्यादा हाथ हमारी
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अच्छा कानून, दिखावटी अमल

सुभाष गाताडेहम लोग अंतरविरोधों की एक नयी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं. राजनीति में हम एक व्यक्ति-एक वोट के सिद्धांत को स्वीकार करेंगे. पर हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में, मौजूदा सामाजिक-ओर्थक ढांचे के चलते हम लोग एक लोग- एक मूल्य के सिद्धांत को हमेशा
 
Reyaz-ul-haque
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कैसा समाज निर्मित कर रहे हैं, हिंदी के नाम पर?

अनिल वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में कल 29 दिसंबर को जहां एक ओर 12 वां स्थापना दिवस मनाया गया, वहीं दूसरी ओर दलित विद्यार्थी पढ़ाई-लिखाई पर अपने अधिकार को हासिल करने के लिए अनशन पर बैठे रहे। इन विद्यार्थियों ने इस दिन
 
Reyaz-ul-haque
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आरक्षण

सामाजिक न्याय के दो मनको मानको मे विरोध हो तो उस मानक को अपनाना चाहिए जिससे समाज का ज्यादा भला हो । आरक्षण देते समय उसका पड़ विशेष और कर्तव्यों की डरती से भी अवलोकन करना चाहिए । मान लीजिये विधवाओं और विकालान्गोकोआरक्षण देना सामाजिक न्याय के अनुरूप हे।
 
राकेश जैन--राजदर्शन
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आरक्षण के असली हकदारों से हक छीना

चुनावी तैयारी में जुटी मनमोहन सरकार हताशा में कुछ ऐसे उलटे-सीधे फैसले कर रही है जिसके लिए आने वाली पीढ़ियां उन्हें शायद ही माफ करे। केंद्रीय कैबिनेट ने शुक्रवार को 'अन्य पिछड़ा वर्ग` (ओबीसी) के ज्यादा से ज्यादा लोगों को सरकारी नौकरियों और शैक्षिणिक स
 
रंजन राजन
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वर्धा में दलित छात्र को नहीं किया जा रहा दाखिला

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में एक दलित छात्र के उत्पीडन और पीएचडी में उसका प्रवेश न लेने के ख़‍िलाफ़ छात्रों ने मंगलवार से आमरण अनशन शुरू कर दिया। छात्र बुधवार को आयोजित होनेवाले दीक्षांत समारोह का भी बहिष्कार करेंगे। आंदो
 
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क्या मायावती जाति के विनाश के ऐतिहासिक कार्यभार को पूरा करेंगीं?

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार और समाजवाद के अध्येता शेष नारायण सिंह के विचार। रिजेक्ट मॉल से साभार. पिछली सदी के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के जानकारों में डा. बीआर अंबेडकर का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। महात्मा गांधी के समकालीन रहे अंबेडकर ने अपने
 
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बिहार के लोग बिहार को बरबाद नहीं होने देंगे : सुशासन बाबू से बातचीत

साधो राह दुनो हम देखा सबसे पहला सवाल आपके घोषणा पत्र से. पार्टियां नये-नये वायदे तो करती रहती हैं और बराबरी व धर्मनिरपेक्षता जैसे नारे लगभग सभी पार्टियों के होते हैं. लेकिन अक्टूबर,2005 के चुनाव में आपका दो नया नारा था, जो अन्य पार्टियों से अलग था-वह
 
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महामारी से ग्रस्त बिहार का मीडिया

नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार के राज-समाज कि एक मुकम्मल पड़ताल जारी है. आईये, बिहार में पिछले साल आयी बाढ़ के दौरान बिहार के मीडिया के रवैये पर दिवाकर के साथ एक नज़र डालें. यह आलेख भी तीन साल-तेरह सवाल पुस्तिका से साभार है.  यह पूरी शृंखला आप
 
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एक-अणे मार्ग में नीतीश और बिहार : प्रतिक्रांति के साल

नीतीश सरकार के चार साल 24 नवम्बर को पूरे हो रहे हैं और मीडिया की मानें तो बिहार में पिछले चार सालों में स्वर्ग उतर आया है. हर जगह चाटुकारों के चारणगीत सुने जा सकते हैं-जिसमें सरकारी प्रचार तंत्र से आगे-आगे है वहां का मीडिया (बल्कि प्रेमचंद के शब
 
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सुविधा के दिनों में गर्दिश के दिनों की याद पैदा करती है रूमानियत

यह जीवन भी रेल में की गई यात्रा की तरह है जहाँ एक स्टेशन से हम यात्रा प्रारम्भ करते है और किसी एक स्टेशन पर समाप्त करते हैं । प्रारम्भ का स्टेशन तो हमें पता होता है लेकिन गंतव्य के स्टेशन का हमें पता नहीं होता  वह कब आयेगा ..हम सशंकित होकर हर कि
 
शरद कोकास
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लगे रहो मुन्ना भाई....!!!!

लगे रहो मुन्ना भाई’ इस नाम से एक फिल्म आई थी बाद में यह शीर्षक ही प्रसिद्ध हो गया। बाहर कितना प्रसिद्ध हुआ यह तो पता नहीं पर हम दोस्तों के बीच आपसी हँसी-मजाक के दौर में यह एक जुमले की तरह इस्तेमाल होने लगा। पिछले कुछ समय से हम अपने एक मंत्री महोदय को
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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राजस्थान में हर आदमी आरक्षित !

राजस्थान में अब हर आदमी आरक्षित वर्ग में आ गया है। एक साल से लटका पड़ा आरक्षण विधेयक राज्यपाल ने पास कर दिया। राज्य में अब राज्य में आरक्षण का दायरा 49 प्रतिशत से बढ़कर 68 प्रतिशत हो जाएगा। 14 प्रतिशत आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग, ईसीबी (राजपूत, ब्राह्मण,
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चींटी की खटिया खड़ी, टिड्डा करता मौज... कहानी में ट्विस्ट है...!

हिन्दी भारत समूह से आने वाला एक सन्देश मिला। प्रेषक थे श्री भगवान दास त्यागी जी। इस अंग्रेजी सन्देश में The Ant and the Grasshopper नामक कहानी को आधार बनाकर भारतीय राजनैतिक समाज की एक विडम्बना को दर्शाया गया है। मुझे यह आख्यान अच्छा और सच्चा लगा। मैन
 
रचना त्रिपाठी