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रीठेल : हमारी छुट्टी का विवरण

लीजिए पेश है, एक पुराने लेख का रीठेल, ये लेख 2006 मे लिखा गया था, तब से लेकर अब तक तीन साल बीत चुके है, लेकिन हफ़्ते की छुट्टी का तरीका नही बदला, इस लेख मे कंही कंही आपको स्वयं का चेहरा नजर आएगा, जहाँ भी नजर आए, टिप्पणी करने से चूकिएगा मत। तो लीजिए [...]
 
Jitendra Chaudhary
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अक्सर ऐसा क्यों होता है जब…

अक्सर हमारे जीवन मे कुछ ऐसी बाते घटती है, कि हम सोचने पर मजबूर हो जाते है कि ऐसा क्यों होता है। लीजिए पेश है कुछ ऐसी घटनाएं। अक्सर ऐसा क्यों होता है जब… आपके हाथ ग्रीस या गुँथे आटे से सने होते है, तभी फोन की घंटी बजती है। अगर पेंच कसते समय, अगर
 
Jitendra Chaudhary
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बुढापे की चिंता

हर व्यक्ति को अपने बुढापे की चिंता होती है, जाहिर है मुझे भी है। सारी जिंदगी तो हम विदेश मे नही रह सकते है ना, कभी ना कभी तो वापस अपने वतन लौटना ही होगा। बच्चों की जिम्मेदारी ने निबटने के बाद, जीवन संध्या मतलब बुढापे मे तो हम चाहेंगे कि हम अपने हम उम्र
 
Jitendra Chaudhary
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धूम्रपान कैसे छोड़ें?

आइए आजकुछ बात करते है धूम्रपान (Smoking) छोड़ने की। वैसे तो धूम्रपान की आदत को छोड़ना आसान नही होता, लेकिन यदि आप मेरे लिखे कुछ प्वाइंट्स के आजमाएंगे तो यकीनन आप धूम्रपान की आदत से छुटकारा पा जाएंगे। इसके पहले मै आपको कुछ बताना चाहूंगा। स्कूल/कालेज टाइम मे
 
Jitendra Chaudhary
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दिल ढूंढता है…फुर्सत के रात दिन

आजकल इस भागदौड़ भरी जिंदगी मे थकना मना है, नही नही भाई मै कोई प्रोडक्ट बेचने की कोशिश नही कर रहा हूँ, बस इस भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर कुछ पल आराम से गुजारने की सलाह दे रहा हूँ। आजकल हम लोग दिन भर ऑफिस/दुकान पर काम करते है, और शाम होते ही इस बोझ [...]
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अराजकता

गाजियाबाद में भीड़ है, अराजकता है, प्रदूषण है, चोरी-डकैती-छीना-झपटी-मारपीट और अशांति है. बिजली यहां मनमाने तरीके से आती है. यही हाल पानी तथा अन्य नागरिक सुविधाओं का है. ऐसा कुछ नहीं है जो इसे विश्वस्तरीय तो क्या राष्ट्र-स्तरीय भी बनाता हो. फिर भी पूरा
 
adhyatan
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सड़क पर हमारा व्यवहार

आज बहुत दिनो बात लिखने का मौका मिला है, चलो जी जित्ता हो सके निबटा लिया जाए। आजकल तो पढने लिखने का मौका ही मिलता, क्या करें, तीन तीन प्रोजेक्ट सर पर है, सबको निबटाना है। एक अकेली जान, हैरान परेशान क्या क्या करूं, इसलिए ब्लॉगिंग बैक बर्नर पर चली गयी ह
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09/09/2009 यानि एक साल और कम

आज 09/09/09 है। यानि कि नौ सितम्बर दो हजार नौ। एक ऐसा दिन जो दोबारा मेरी जिन्दगी मे नही आएगा। वैसे आज का दिन कुछ खास भी है, क्योंकि आज के दिन ही मै पैदा हुआ था। अब कितने साल का हो गया, ये मत पूछना, मै शरमा जाऊंगा। वैसे दिल से तो मै अभी [...]
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मेरा पन्ना के पाँच साल पूरे

लीजिए जनाब, मेरे हिन्दी ब्लॉग मेरा पन्ना के इसी सप्ताह पाँच साल पूरे हो गए। ये पाँच साल कब गुजर गए पता ही नही चला। पाँच साल के जीवन काल मे मै ब्लॉगिंग के विभिन्न चरणो से गुजरा। नव ब्लॉगर से उत्साही ब्लॉगर, उत्साही ब्लॉगर से स्थापित ब्लॉगर, अच्छी कमाई
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बहती नाक, खिसकती निक्कर

लगता है ये हफ़्ता, बचपन की यादें सप्ताह होकर रहेगा। बचपन की यादों मे जब भी गोते लगाओ, काफी मजा आता है। इसी बहाने वर्तमान की परेशानियों से कंही दूर हँसता खिलखिलाता बचपन याद करके हम तरोताजा हो उठते है। सच है कितना अच्छा था अपना बचपन। सभी लोगों की बचपन क
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बचपन के खुराफाती शौंक : 2

पिछली पोस्ट मे हमने बात की थी बचपन के खुराफाती शौंक डाक टिकटों के संग्रह की। वैसे तो डाक टिकटों के संग्रह मे अच्छे खासे पैसे खर्च हो चुके थे, लेकिन वो बचपन ही क्या जो नयी नयी चीजें ना ट्राई करे। बस जनाब थोड़े ही दिनो मे हमारा डाकटिकटों से जी ऊब गया। ह
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बचपन के खुराफाती शौंक : 1

हम सभी ने बचपन मे ढेर सारी शरारतें की होंगी, अब चिट्ठाकार है तो निसंदेह बचपन(अभी भी कौन से कम है) मे खुराफाती रहे ही होंगे। नयी नयी चीजें ट्राई करना और नए नए शौंक पालना किसे नही पसन्द? तो आइए जनाब आज बात करते है बचपन के कुछ खुराफाती शौंक की। इसी बहान
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बचपन के खुराफाती शौंक :2

पिछली पोस्ट मे हमने बात की थी बचपन के खुराफाती शौंक डाक टिकटों के संग्रह की। वैसे तो डाक टिकटों के संग्रह मे अच्छे खासे पैसे खर्च हो चुके थे, लेकिन वो बचपन ही क्या जो नयी नयी चीजें ना ट्राई करे। बस जनाब थोड़े ही दिनो मे हमारा डाकटिकटों से जी ऊब गया। ह
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बचपन के खुराफाती शौंक

हम सभी ने बचपन मे ढेर सारी शरारतें की होंगी, अब चिट्ठाकार है तो निसंदेह बचपन(अभी भी कौन से कम है) मे खुराफाती रहे ही होंगे। नयी नयी चीजें ट्राई करना और नए नए शौंक पालना किसे नही पसन्द? तो आइए जनाब आज बात करते है बचपन के कुछ खुराफाती शौंक की। इसी बहान
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अच्छाई को आचरण में लाने का साँफ़्टवेयर नहीं बनेगा कभी.

अच्छाई और नेकी करने का मौक़ा ईश्वर सबको देता है.कुछ उसे भुना लेते हैं और कर गुज़रते हैं और कुछ सिर्फ़ सोचते ही रहते हैं और भाग्य को कोसते रहते हैं...या दूसरों के भाग्य से कुढ़ते रह्ते हैं.दर-असल हमारा वैचारिक परिवेश इतना आत्म-केंद्रित हो गया है कि अच्छाइ
 
शब्द-सृष्टि
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रेल के स्लीपर डब्बों में ‘अतिरिक्त सीट’ पर एक सर्वेक्षण

कुछ दिन पहले सफर की कतरनें लिखते समय भारतीय रेले के स्लीपर क्लास डब्बों में साइड में तीसरी बर्थ घुसा देने से हुई परेशानी पर लिखा था…। कुछ अन्य लोगों ने भी इससे हुई परेशानी का जिक्र किया था। सागर भाई ने भी अपनी एक पोस्ट में इसका जिक्र किया था। र