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विदुर नीति-दुष्टों को अनदेखा करने से जनता नाराज होती है

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।हिन्दी में भावार्थ-यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की
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श्री गुरवाणी-अहंकार और आडम्बर बढ़ाने वाला दहेज़ किस काम का (dahej ki kaam ka-shri gurvani)

होर मनमुख दाज जि रखि दिखलाहि,सु कूड़ि अहंकार कच पाजोश्री गुरू ग्रन्थ साहिब के अनुसार लड़की के विवाह में  ऐसा दहेज दिया जाना चाहिए जिससे मन का सुख मिले और जो सभी को दिखलाया जा सके। ऐसा दहेज देने से क्या लाभ जिससे अहंकार और आडम्बर ही दिखाई दे।‘हरि
 
दीपक भारतदीप
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संत कबीर के दोहे-मनुष्य माया रूपी दीपक के इर्द गिर पतंगे कि तरह चक्कर काटता है

संत कबीरदास जी के अनुसार---------------------------------माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पड़ंतकह कबीर गुरु ग्यान तैं, एक आध उमरन्तइसका आशय यह है कि मनुष्य एक पंतगे की तरह माया रूपी दीपक के प्रति आकर्षण में भ्रमित रहता है। वह अपना जीवन उसी के इर्द
 
दीपक भारतदीप
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भर्तृहरि नीति शतर्क-मणि होने के बावजूद विषधर से कोई प्रेम नहीं करता

आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्। दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की
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चाणक्य नीति दर्शन-अपने गुणों की स्वयं प्रशंसा करना अज्ञान का प्रमाण (khud ki taarif agyan ka praman-chankya neeti)

पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी भवेत्।इन्द्रोऽ लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।हिन्दी में भावार्थ-चाहे कोई मनुष्य कम ज्ञानी हो पर अगर दूसरे उसके गुणों की प्रशंसा अन्य लोग  करते हैं तो वह गुणवान माना जायेगा किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी है और
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रहीम सन्देश-सच्चे परमार्थी कभी भेदभाव नहीं करते (sachche parmarthi-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते हैं कि_____________________ रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीचमांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच जिस मनुष्य को  परोपकार का काम  करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। दूसरों के  परोपकार करते हुए उच्च कोटि कि मनुष्य कभी
 
दीपक भारतदीप
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मनुस्मृति-भोजन करते समय मन को प्रसन्न रखें (hindu dharma sandesh-tanavmukt hokar bhojan grahan karen)

पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चेतकुत्सयन्दृष्टवा हृध्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः।।हिंदी में भावार्थ-मनुष्य को जैसा भोजन मिले उसे देखकर प्रसन्नता हासिल करना चाहिए। उसे ईश्वर प्रदत्त मानकर गुण दोष न निकालते हुए उदरस्थ करें। भोजन करते हुए अपनी झूठन न छोड़ें।
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भर्तृहरि नीति शतक-दूसरों का मुंह ताकने से कोई लाभ नहीं

किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यःप्रघ्वस्ता तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रस्भमपगतप्रश्रयाणां खलानांदुःखाप्तसवल्पवित्तस्मय पवनवशान्नर्तितभ्रुलतानि ।।हिंदी में भावार्थ- वन और पर्वतों पर क्या फल और अन्य
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संत कबीर के दोहे-बियावन वन के फूल बिना काम किसी के काम आये मुरझा जाते हैं

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुरायलोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जायसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।बड़ा
 
दीपक भारतदीप
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चाणक्य दर्शन-धैये हो तो धनाभाव संकट नहीं बनता (dhiraj hi dhan hai-chankya neeti)

दरिद्रता श्रीरतया विराजते कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते।कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीतया विराजते।।हिंदी में भावार्थ- अगर मनुष्य में धीरज हो तो गरीबी की पीड़ा नहीं होती। घटिया वस्त्र धोया जाये तो वह भी पहनने योग्य हो जाता है। बुरा अन्न भी गरम होने पर
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पतंजलि योग साहित्य-जात पांत से मुक्त होने पर ही जीवन का आनंद

जातिदेशकालसमयानमच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।हिन्दी में भावार्थ-जाति, देश, काल तथा व्यक्तिगत सीमा से रहित होकर सावैभौमिक विचार का हो जाने पर मनुष्य एक महावत की तरह हो जाता है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि यहां पर मनुष्य को संकीर्ण
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रहीम के दोहे-सीधी चाल से ही किसी का दिल जीता जा सकता (sidhi chal se dil jeeten-rahim ke dohe)

प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिंरहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिंकविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी
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विदुर दर्शन-सत्य से ही धर्म की रक्षा संभव (satya se hi dharma ki raksha sanbhav)

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते।।हिन्दी में भावार्थ-सत्य से धर्म, योग से विद्या, सफाई से सुंदरता और सदाचार से कुल की रक्षा होती है।  पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवाः।।पतयो बान्धवा
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विदुर दर्शन-क्षमावन पुरुष की राह देवता भी देखते हैं (kshamavan purush aur devata)

अतिवादं न प्रवदेव वाद्येद् योऽनाहतः प्रतहन्यान्न घातयेत्।हन्तुं च यो नेच्छति पापकं वै तस्मै देखाः समुहयन्त्यागताय।।हिन्दी में भावार्थ-जो स्वयं किसी के प्रति बुरी बात न स्वयं कहता न दूसरे को कहने के लिये प्रेरित करता, बिना मार खाये किसी को नहीं मारता और न
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रहीम संदेश-मनुष्य नाचता है कठपुतली की तरह (manushya kathputli hai-rahim sandesh)

ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गातअपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथकविवर रहीम कहते हैं कि जैसे नट कठपुतली को नचाता है वैसे ही मनुष्य को उसके कर्म नाच करने के लिऐ बाध्य करते हैं। जिन्हें हम अपने हाथ समझते हैं वह भी अपने नियंत्रण में नही होते हैं।वर्तमान
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कबीरदास जी के दोहे-मनुष्य की खोपड़ी उल्टा काम करती है (mind of men-kabir sandesh)

कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिंतीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिंसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा
 
दीपक भारतदीप
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संत कबीरदास जी के दोहे-राम की भक्ति का रंग न चढ़े तो दोष किसे दें(ram ki bhakti ka rang-kabirdas ji ke dohe)

राम नाम को छाड़ि कर, करे और की आस।कहैं कबीर ता नर को, होय नरक में वास।।संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो मनुष्य राम नाम का स्मरण छोड़कर विषय वासना में रत हो जाते हैं उनको नरक में जाकर निवास करना पड़ता है।मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।कहु धौं कौन
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विदुर दर्शन-दुस्साहसी की अनदेखी करने पर प्रजा नाराज होती है

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।हिन्दी में भावार्थ-यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की
 
दीपक भारतदीप
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Iravati अरुंधती

तू माने या ना माने दिलदारा बाबा बुल्लेशाह गेले दोन दिवस मला सूफी गाण्यांनी घेरलंय! असाच कधी अवचित येतो मूड आणि सुरू होते एक अद्भुत स्वरमयी भक्तीयात्रा!ही गाणी अवीट गोडीची, गूढ अर्थांची, आत्मा - परमात्म्याशी संवाद साधणारी तर आहेतच; शिवाय
 
iravati अरुंधती kulkarni
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विदुर नीति-धर्म का दिखावा करना अहंकार का प्रमाण (dharma aur ahnakar-hindi sandesh)

इन्याध्ययनदानादि तपः सत्यं क्षमा घृणा। अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः समृतः।।हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद विदुर का कहना है कि यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और अलोभ वह गुण है जो धर्म के मार्ग भी हैं।  तत्र पूर्वचतुर्वर्गो दम्भार्थमपि
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विदुर दर्शन-प्रजा को आजीविका न देने वाला राष्ट नष्ट हो जाता है (kingdom and public-hindu dharma sandesh)

आजीव्यः सर्वभूतानां राजा पज्र्जन्यवद्भुवि।निराजीव्यं त्यजन्त्येनं शुष्कवृक्षभिवाउढजाः।।हिंदी में भावार्थ-राजा मेघों के समान सब प्राणियों को आजीविका देता है। जो राजा प्रजा को आजीविका नहीं दे पाता उसका साथ सभी छोड़ जाते हैं, जिस प्रकार पेड़ को पक्षी छोड़ जाते
 
दीपक भारतदीप
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श्री गुरुवाणी-चोर और जुआरी घानी में पीसे जाने योग्य (chor aur juari dandyogaya-shri guruvani)

‘चोर जार जूआर पीढ़ै घाणीअै।’हिन्दी में भावार्थ-श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार चोर और जुआरी घानी में पीसे जाने योग्य होते हैं।‘सच्चा साहु सचो वणजारि। सचु वणंजहि गुर हेति अपारे।।सचु विहाझहि सचु कमावहि सचो सचु कमावणआ।।हिन्दी में भावार्थ-श्री गुरुग्रंथ साहिब
 
दीपक भारतदीप
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मनुस्मृति-श्रमिक का हाथ सदैव पवित्र रहता है (worker is hollyman-hindu dharma sandesh)

नित्यमास्यं शुचिः स्त्रीणां शकुनि फलपातने।प्रस्त्रवे च शुचर्वत्सः श्वा मृगग्रहणे शुचिः।।हिन्दी में भावार्थ-नारियों का मुख, फल गिराने के लिये उपयोग  में लाया गया पक्षी, दुग्ध दोहन के समय बछड़ा तथा शिकार पकड़ने के लिये उपयोग में लाया गया कुत्ता पवित्र
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श्रीगुरुवाणी-घमंड अनेक संकटों का कारण (shri guruvani-ghamand sankat ka karan

‘हउमै नावै नालि विरोध है, दोए न वसहि इक थाई।।’हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण अहंकार है और इससे अन्य बुराईयां भी पैदा होती है।जह गिआन प्रगासु अगिआन मिटंतु।हिन्दी में भावार्थ-गुरु ग्रंथ साहिब के मतानुसार जिस प्रकार अंधेरे को दूर करने के लिये
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संत कबीर दास के दोहे-परोपकार पर ही यश मिलना संभव (kabir ke dohe-paropkar aur yash)

धन रहै न जोबन रहे, रहै न गांव न ठांव।कबीर जग में जस रहे, करिदे किसी का काम।संत कबीर दास जी कहते हैं कि एक दिन यह न धन रहेगा न यह यौवन ही साथ होगा। गांव और घर भी छूट जायेगा पर रहेगा तो अपना यश, यह तभी संभव है कि हमने किसी का काम किया हो।स्वारथ सूका लाकड़ा,
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-हंसों में बगुले की तरह होता है ज्ञानियों में अज्ञानी (economic of kautilya-hans aur bagula)

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।हिन्दी में भावार्थ--ऐसे माता पिता अपनी संतान के बैरी है जो उससे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति कभी भी बुद्धिमानो की सभा में सम्मान नहीं पाता। वहां उसकी स्थिति हंसों के झुण्ड
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पतंजलि योग दर्शन-योगाभ्यास से उत्पन्न विवेक से प्रकाश फैलता है

योगांगनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।हिन्दी में भावार्थ-योग साधना के द्वारा अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर जो विवेक का प्रकाश फैलता है उससे निश्चित रूप से ख्याति मिलती है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पतंजलि योग
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विदुर दर्शन-सत्संग से बुद्धि प्राप्त करे वही पण्डित (satasang kare vahi pandit-hindu

प्रज्ञामेवागमयति यः प्राज्ञेभ्यःस पण्डितः।प्राज्ञो ह्यवापप्य धर्मार्थौं शक्नोति सुखमेधितम्।।हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद विदुर जी के मतानुसार जो मनुष्य बुद्धिमानों की संगत कर सद्बुद्धि प्राप्त करता है वही पण्डित है। बुद्धिमान पुरुष ही धर्म और अर्थ को
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भर्तृहरि नीति शतक-यहाँ हर कोई अभिनेता है (all men is actor-hindu dharma sandesh)

क्षणं बालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिकः क्षणं वितैहीनः क्षणमपि च संपूर्णविभवः।जराजीर्णेंगर्नट इव वलीमण्डितततनुर्नरः संसारान्ते विशति यमधानीयवनिकाम्।।हिन्दी में भावार्थ-क्षण भर के लिये बालक, क्षणभर के लिये रसिया, क्षण भर में धनहीन और क्षणभर में संपूर्ण
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चाणक्य दर्शन-आमदनी से अधिक खर्च मुसीबत का कारण (amdani aur kharcha-chankya niti)

अनालोक्य व्ययं कर्ता ह्यनाथःः कलहप्रियः।आतुर सर्वक्षेत्रेपु नरः शीघ्र विनश्चयति ।।हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि बिना विचारे ही अपनी आय के साधनों से अधिक व्यय करने वाला सहायकों से रहित और युद्धों में रुचि रखने वाला तथा कामी आदमी का बहुत
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भर्तृहरि नीति शतक-धन कि उष्मा से मनुष्य की प्रतिष्ठा बढ़ती है (Dhan aur pratishtha-hindi sandesh)

तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव। अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।। हिन्दी में भावार्थ-एक जैसी इंद्रियां, एक जैसा नाम और काम, एक ही जैसी बुद्धि और वाणी पर फिर भी जब आदमी धन की गरमी से क्षण भर
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Iravati अरुंधती

अक्कामहादेवी - एक बंडखोर स्त्रीमुक्तीवादी संत कवयित्रीअक्कामहादेवी! बाराव्या शतकातील एक अत्युच्च भक्तीच्या मार्गाचा प्रसार करणारी, आगळी वेगळी स्त्रीमुक्तिवादी संत! कन्नड संत साहित्यात तिने आपल्या भक्ती वचनांची जी अनमोल भर घातली आहे त्यासाठी ती कायम
 
iravati अरुंधती kulkarni
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ईर्ष्या जैसी व्याधि की कोई दवा नहीं

य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये। सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।। हिंदी में भावार्थ-जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठा से ईर्ष्या करता है उसकी व्याधि की कोई औषधि नहीं है। न कुलं वृत्तही प्रमाणमिति मे मतिः। अन्तेध्वपि हि जातानां
 
दीपक भारतदीप
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चाणक्य दर्शन-अपयश से प्राप्त धन किसी काम का नहीं (hindi adhyamik sandesh-Dhan aur yash)

अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।हिन्दी में भावार्थ-जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचाने या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी
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भर्तृहरि नीति शतक-गरीब होने पर भी ज्ञानी सम्मानीय होता है (garibi aur gyan-hindi sandesh)

शास्त्रोपस्कृतशब्द सुंदरगिरः शिष्यप्रदेयाऽऽगमा विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभर्निर्धनाः।तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य कवयस्त्वर्थ विनाऽपीश्वराः कुत्स्या स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः।।हिन्दी में भावार्थ- ग्रंथों का अध्ययन से उसमें वर्णित
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चाणक्य नीति और दर्शन-अधिक व्यय करना कष्टदायी होता है

अनालोक्य व्ययं कर्ता ह्यनाथःः कलहप्रियः।आतुर सर्वक्षेत्रेपु नरः शीघ्र विनश्चयति ।।हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि बिना विचारे ही अपनी आय के साधनों से अधिक व्यय करने वाला सहायकों से रहित और युद्धों में रुचि रखने वाला तथा कामी आदमी का बहुत
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मनु संदेश-गायत्री मंत्र और शांति पाठ का जाप करना फलदायी (Gayatri mantra aur shanti path-manu smriti)

सावित्रांछान्ति होमाश्य कुर्यात्पर्वसु नित्यशः।पितृंश्चैवाष्टकास्वर्चयेन्तिन्त्यमन्वष्टकासु च।।हिन्दी में भावार्थ-अमावस्या, पूर्णमासी तथा अन्य त्यौहारों पर गायत्री मंत्र तथा शांति मंत्र का जाप अवश्यक करना चाहिये।मंगलचारयुक्त्तः
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संत कबीर के दोहे-कामना सहित भक्ति में निराशा भी हाथ लगती है

मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
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कौटिल्य दर्शन-निंदा रहित मनुष्य देवता समान

स्वभावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन व बान्धवान्।स्त्रीभृत्यान् प्रेमदानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम्।।हिन्दी में भावार्थ-स्वभाव से मित्र, सद्भाव स बंधुजन, प्रेमदान से स्त्री और भृत्यों को चतुराई से वश में करें।ये प्रियाणि प्रभाषन्ते प्रयच्छन्ति च
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विदुर दर्शन-दोष दृष्टि रहित होने पर ही आनंद की प्राप्ति

प्रज्ञामेवागमयति यः प्राज्ञेभ्यःस पण्डितः।प्राज्ञो ह्यवापप्य धर्मार्थौं शक्नोति सुखमेधितम्।।हिन्दी में भावार्थ-नीति विशारद विदुर जी के मतानुसार जो मनुष्य बुद्धिमानों की संगत कर सद्बुद्धि प्राप्त करता है वही पण्डित है। बुद्धिमान पुरुष ही धर्म और अर्थ को