" एक तर्जुमा मेरा भी "
लखनऊ की तंग गलियों से गुज़रते हुए दो शोहदों को अदब से लड़ते देखा जब तो उनकी इस तकरार पर प्यार आ गया। उनका तर्जुमा कितना सच्चा रवाँ रवाँ सा था वरना इस जहाँ में सच तो सिर्फ़ एक लफ्ज़ है और झूठ कारोबार, एक खोखली बुनियाद के साथ। शायद ! इसी वजह से हर साल.
Dec 22 2009 09:10 PM



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