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बड़ा मुश्किल है आदमी का पेड़ हो जाना

बड़ा मुश्किल है आदमी का पेड़ हो जाना,पेड़ की गोद में हजारों घर बसते हैं बड़ा मुश्किल है आदमी का पेड़ हो जाना ,बडा मुश्किल है जड़ और चेतन के साथ एक हो जाना,बड़ा मुश्किल है आदमी का पेंड़ हो जान
 
acharyakeshav
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होमवर्क खरीदने का जमाना

मेरा आम तौर पर यह प्रयास रहा है कि मैं ब्लॉग के लिए ऐसे टॉपिक उठाऊं जो हमें, यानी आम लोगों को प्रभावित करे। मुझे यह लगता है कि इससे कहीं न कहीं थोड़ा असर जरूर पड़ता है। पर शायद ही मैंने कभी किसी विषय पर इतने उत्तेजित मन से कभी कुछ लिखा है, जैसा कि इस
 
राजेश कालरा
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रंग – कविता – रवि कुमार

रंग (a poem by ravi kumar, rawatabhata) रंग बहुत महत्वपूर्ण होते हैं इसलिए भी कि हम उनमें ज़्यादा फ़र्क कर पाते हैं कहते हैं पशुओं को रंग महसूस नहीं हो पाते गोया रंगों से सरोबार होना शायद ज़्यादा आदमी होना है यह समझ गहरे से पैबस्त है दिमाग़ों में तभी तो यह
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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हे ईश्वर...कहां हो...?

ईश्वर तो यकीनन है...एक बार की बात है ईश्वर अपने लिए एकांत खोज रहा था...मगर अनगिनत संख्या में मानव जाती के लोग उसे एकांत या विश्राम लेने ही नही देते थे...नारद जी वहां पहुंचे...ईश्वर का गमगीन चेहरा देख,परेशानी का सबब पूछा...कारण जान हंसने लगे...ईश्वर ह
 
पिंटू कुमार
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एक सवाल आप सबसे!

एक सवाल जो आज सुबह से मेरे जहन में उठ रहा है। ओ मै आप लोगो से पूछ रहा हूँ.और इस सवाल को पढ़ कर आप लोगो के मन में जो भी जबाब आए दे सकते है। क्योंकि आप लोग अपनी प्रतिक्रिया देंगे तो मै उसी प्रतिक्रिया के ऊपर मै अपना प्रतिक्रिया दूंगा। सवाल - वह कोन सी म
 
पिंटू कुमार
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जानवर

हाँ मैंने माना कि मै जानवर हूँ हाँ मैंने माना कि मै जानवर हूँ पर................ क्या? तुम अपने को इंसान कह सकते हो ? मैंने न मारा किसी को न की गाली -गलोच न किसी को रुलाया- सताया पर तब भी न जाने क्यों? जानवर मै कहलाया कहते है तुम हो बुद्धिमान पर क्या
 
प्रतिमा
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चित्र में दिखाये गये जानवर का नाम शरद कोकास है

पिछली कड़ियों में आपने बकरी,ऊँट और भैंस के बारे में मशहूर लेखक जनाब इब्ने इंशा के विचार पड़े ,इस किश्त में पढ़िये "आदमी " नामक जानवर के बारे में उनके विचार उनकी पुस्तक "उर्दू की आखरी किताब से" ।          &nbs
 
शरद कोकास
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आदमी या बन्दर

हममे और उनमे क्या अन्तर है हम भी माँगते है वो भी माँगते है हम भी दौड्ते है वो भी दौडते है हम भी छीनते है वो भी छीनते है हमसे भी खौफ खाते है उनसे भी खौफ खाते है हम भी आसमाँ पाना चाहते वो भी पाना चाहते है बस फर्क इतना हम आदमी है वो बन्दर है
 
Dhiraj Shah
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