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तुमने मुझे एक घड़ी दी थी…

तुम्हें याद है…तुमने मुझे एक घड़ी दी थी-कुहुकने वाली घड़ी । मेरे हाँथों में देकर मुस्करा कर कहा था, "इससे वक्त का पता चलता है । यह तुम्हें मेरी याद दिलायेगी । हर शाम चार बजे कुहुक उठेगी । आज भी….चार ही न बज रहे हैं अभी…लगता है बाकी हैं कुछ सेकेण्ड ।" फ
 
हिमांशु । Himanshu
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मैं सहजता की सुरीली बाँसुरी हूँ…

मैं सहजता की सुरीली बाँसुरी हूँ घनी दुश्वारियाँ हमको बजा लें । मैं अनोखी टीस हूँ अनुभूति की कहो पाषाण से हमको सजा लें । मैं झिझक हूँ, हास हूँ, मनुहार हूँ प्रणय के राग में इनका मजा लें । आइने में शक़्ल जो अपनी दिखी है उसी को वस्तुतः अपना बना लें । मिलन
 
हिमांशु । Himanshu
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के० शिवराम कारंत : ’मूकज्जी’ का मुखर सर्जक

के० शिवराम कारंत’ - भारतीय भाषा साहित्य का एक उल्लेखनीय नाम, कन्नड़ साहित्य की समर्थ साहित्यिक विभूति, बहुआयामी रचना-कर्म के उदाहरण-पुरुष !  सर्जना में सत्य और सौन्दर्य के प्रबल जिज्ञासु कारंत जीवन को सम्पूर्णता और यथार्थता में निरखने की निरंतर च
 
हिमांशु । Himanshu
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याद कर रहा हूँ तुम्हें, सँजो कर अपना एकान्त ...

उन दिनों जब दीवालों के आर-पार देख सकता था मैं अपनी सपनीली आँखों से, जब पौधों की काँपती अँगुलियाँ मेरी आत्मा को सहला जाती थीं, जब कुहासे की टटकी बूँदे बरस कर भिंगो देती थीं मन-वसन, जब पारिजात-वन का तारक-पुष्प झर-झर झरता था मेरी चेतना के आँगन - तब भी त
 
हिमांशु । Himanshu
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रचना क्या है, इसे समझने बैठ गया मतवाला मन

कविता ने शुरुआत से ही खूब आकृष्ट किया । उत्सुक हृदय कविता का बहुत कुछ जानना समझना चाहता था । इसी अपरिपक्व चिन्तन ने एक दशक पहले कुछ पंक्तियाँ लिखीं । मेरी शुरुआती छन्द की रचनाओं के प्रयास दिखेंगे यहाँ । पढ़ते-लिखते जितना जाना-समझा था (वह बहुत न्यून था
 
हिमांशु । Himanshu
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-राजा वही जो प्रजा को आजीविका प्रदान करे (raja vahi jo rojgar de-hindu sandesh)

आजीव्यः सर्वभूतानां राजा पज्र्जन्यवद्भुवि। निराजीव्यं त्यजन्त्येनं शुष्कवृक्षभिवाउढजाः।। हिंदी में भावार्थ- राजा मेघों के समान सब प्राणियों को आजीविका देता है। जो राजा प्रजा को आजीविका नहीं दे पाता उसका साथ सभी छोड़ जाते हैं, जिस प्रकार पेड़ को पक्षी छ
 
दीपक भारतदीप
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विदुर नीति-विवेकहीन से मित्रता नष्ट हो जाती है (vivekhin se mitrta-hindi sandesh)

अवलिसेषु मूर्खेषु रौद्रसाहसिकेषु च। तथैवापेतधर्मेषु न मैत्रीमाचरेद् बुधः।। हिंदी में भावार्थ- समझदार मनुष्य के लिये यही उचित है कि अहंकारी, अज्ञानी, क्रोधी, दुस्साहसी तथा धर्महीन मनुष्य से मित्रता न करे। दुर्बुद्धिमतकृतप्रज्ञं छन्नं कूपं तृणरिव। विवज
 
दीपक भारतदीप
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विदुर नीति-मतिमान और गतिमान को सहारा देने वाले ही संत

गतिरात्मवतां सन्तः सन्त एवं सतां गतिः। असतां च गतिः सन्तो न त्वसन्तः सतां गतिः।। हिंदी में भावार्थ- मतिमान और गतिमान पुरुषों को सहारा देने वाले संत हैं। संतों को भी सहारा देने वाले संत हैं। असत्य पुरुषों को भी संत सहारा देते हैं पर दुष्ट लोग किसी को
 
दीपक भारतदीप
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चाणक्य नीति-डसें नहीं फन तो फैलायें (chankya niti-fun)

निर्विषेणाऽपि सर्पेण कत्र्तव्या महती फणा। विषमस्तु न चाष्यस्तु घटाटोपो भयंकरः।। हिंदी में भावार्थ- भले ही अपने पास विष न हो पर विषहीन सर्प को फिर भी फन फैलाने का आडंबर करना चाहिये। उसके बचाव के लिये यह जरूरी होता है। प्रातद्र्यूतप्रसंगेन मध्याह्ये स्
 
दीपक भारतदीप
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विदुर नीति-धनी बंधू के पास जाकर कष्ट न पाना

ज्ञातयस्यतारयन्तीह ज्ञातयो मज्जयन्ति च। सुवृत्तास्तारयन्तीह दुर्वंतत्ता मज्ज्यन्ति च।। हिंदी में भावार्थ- इस संसार में अपने ही जाति बंधु जीवन की नैया पार भी लगाते हैं तो डुबोते भी है। जो सदाचारी है वह तो तारने के लिये तत्पर रहते हैं और जो दुराचारी है
 
दीपक भारतदीप
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चाणक्य नीति-आलस्य मनुष्य का शत्रु (alasya manushya ka shatru-chankya niti)

आलस्योपहता विद्या परहस्तगताः धनम्। अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्।। हिंदी में भावार्थ- आलस्य विद्या का नष्ट करता है। दूसरे के अधिकार में गया धन वापस नहीं आता। कम बीज वाला खेत नष्ट हो जाता है। बिना नायक के सेना हार जाती है। अभ्यासाद्धार्यत विद
 
दीपक भारतदीप
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शुभे ! मृदु-हास्य से चम्पक खिला दो (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

यह देखिये कि बूँदे बरसने लगीं हैं , सूरज की चातुरी मुंह छुपा रही है और ग्रीष्म ने हिला दिये हैं अपने हाँथ  और इधर मैं हूँ कि ग्रीष्म के कनकवर्णी चम्पक को ही विस्मृत किये बैठा हूँ । यह कैसे संभव है कि जिस पुष्प की कांचन प्रतिभा से ग्रीष्म की रागि
 
हिमांशु । Himanshu
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संत कबीर वाणी-अंधे हाथी छूकर करते हैं अपना अपना बखान (andhon ka hathi-sant kabir vani)

भीतर तो भेदा नहीं, बाहर कथै अनेक। जो पै भीतर लखि पर, भीतर बाहिर एक। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अंदर तो प्रवेश किया नहीं पर उस आत्ममय रूप के बाहर अनेक वर्णन किये जाते हैं। एक बार अगर हृदय में उस आत्मा रूप को समझ लें तो फिर अंदर बाहर एक जैसे हो
 
दीपक भारतदीप
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संत कबीर वाणी-मांस का भक्षण मनुष्य के लिये नहीं (Kabir ke dohe)

यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय। मुख में आमिष मेलहिं, नरक पड़े सो जाये।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मांस तो श्वान का भोजन है फिर मनुष्य की देह पाकर उसे क्यों खाये। यह जानते हुए भी जो मांस खायेगा वह नरक में जायेगा। मांस मछलियां खात है, स
 
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संत कबीर वाणी-गाली का जवाब न देने वाला संत (kabir ke dohe)

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक। कहैं कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब गाली आती है तो एक ही होती है पर उसका जवाब देने पर उसकी संख्या बढ़ती जाती है। अगर कोई मूर्ख आदमी गाली बकता है तो बुद्धिमान का काम है कि वह चुप हो
 
दीपक भारतदीप
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भर्तृहरि शतक-विद्वान की होती है दो प्रकार की गति

संसारेऽस्मिन्नसारे परिणतितरले द्वे गती पण्डितानां तत्वज्ञानामृताम्भः प्लवललितयां वातु कालः कदाचित्। नो चेन्मुग्धांनानां स्तनजघनघना भोगसम्भोगिनीनां स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलीलोद्यतानाम्।। हिंदी में भावार्थ- इस परिवर्तनशील दुनियां में विद्वान
 
दीपक भारतदीप
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चाणक्य नीति-थोड़े अभ्यास से भी ज्ञान का घड़ा भर जाता है

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।। हिंदी में भावार्थ- जिस तरह एक एक बूंद से घड़ा भर जाता है उसी तरह नित प्रतिदिन थोड़े थोड़े अभ्यास से समस्त विद्यायें, धन और धर्म में भी श्रीवृद्धि की जा सकती है। नाह्यरं चिन्तय
 
दीपक भारतदीप
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फूलो अमलतास ! सुन्दरियाँ थिरक उठी हैं (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

स्वर्ण-पुष्प वृक्ष की याद क्यों न आये इस गर्मी में । कौन है ऐसा सिवाय इसके जो दुपहरी से उसकी कान्ति चुराकर दुपहर से भी अधिक तीव्रता से चमक उठे और सारा जीवन सारांश अभिव्यक्त करे । वह कौन-सी जीवनी शक्ति है जो इस अमलतास को जीवन्त बनाये रखती है कठिनतम धू
 
हिमांशु । Himanshu
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मनु स्मृति-खीर, रबड़ी और मालपुआ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

आरण्यानां च सर्वेषां मृगानणां माहिषां बिना। स्त्रीक्षीरं चैव वन्र्यानि सर्वशक्तुनि चैव हि।। हिंदी में भावार्थ- भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं तथा स्त्री का दूध पीने योग्य नहीं होता। सभी सड़े गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं होते। इस सभी के स
 
दीपक भारतदीप
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संत कबीर वाणी-भय इंसान की पारणमणि

भय बिन भाव न ऊपजै, भय बिनु होय न प्रीति। जब हिरदे से भय गया, मिटी सकल रस रीति।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भय के बना हृदय में भाव नहीं पैदा होता। बिना भय के प्रीति नहीं होती। जब हृदय से भय मिट गया तो सभी प्रकार के रस और रीति भी मिट जाती है। भ
 
दीपक भारतदीप
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मनुस्मृति-बिना प्रयोजन कौतुहल नहीं करें

न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्। नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।। हिंदी में भावार्थ- मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये। न कुर्व
 
दीपक भारतदीप
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टिप्पणी अदृश्य होकर करते हैं हम ...

आशीष जी की यह पोस्ट पढ़कर टिप्पणी नियंत्रण का हरबा-हथियार (मॉडरेशन) हमने भी लगाया ही था कि पहली टिप्पणी अज्ञात साहब की ही आ गयी । रोचक है, और उपयोगी भी । कितना सच्चा अर्थ पकड़ा है उन्होंने मेरी कविता का ? आप भी देखें -
 
हिमांशु । Himanshu
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सही कहा तुमने.....

वर्ष अतीत होते रहे पर धीरज न चुका और न ही बुझा तुम्हारा स्नेह युक्त मंगल प्रदीप, महसूस करता हूँ- तुम समय का सीना चीर कर यौवन के रंगीले चित्र निर्मित करोगे, एक कहानी लिखोगे, जिसमें होगा स्नेह-स्वप्न-जीवन का इतिवृत्त, और प्रतीक्षा में डबडबायी मेरी आँखे
 
हिमांशु । Himanshu
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विदुर नीति-अपनों में विश्वास उत्पन्न करने वाला ही श्रेष्ट

जो राज्य प्रमुख मनुष्यों अपने प्रति विश्वास उत्पन्न करने का तरीका जानता है और जो किसी अपराधी के अपराध का प्रमाण मिल जाने पर उनको दंड देता है उसके पास अपार धन संपदा चली आती है। राज्य प्रमुख को कम या दंड अधिक मात्रा में दंड देने के साथ ही क्षमा करना भी
 
दीपक भारतदीप
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उच्च पद पर बने रहने की चिंता आदमी को निम्नकोटि का बना देती है

उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदन्यायच्छतै महान्। नवैनींचैस्तरां याति निपातभयशशकया।। हिंदी में भावार्थ- जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने वाला व्यक्ति महान पद् पर तो विराजमान हो जाता है पर उससे नीचे गिरने की भय और आशंका से वह नैतिक आधार पर नीचे से नीचे गिरता जाता
 
दीपक भारतदीप
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रहीम के दोहे-परोपकारी लोग धन्य हैं

वे रहीम नर धन्य है, पर उपकारी अंग। बांटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी के रंग।। कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे मेंहदी बांटने वाले को उसका रंग लग जाता है वैसे ही वे मनुष्य धन्य हैं जो परोपकार में लीन हैं। रहिमन तब लगि ठहरिए, दान मान सनमान। घटत मान देखिय जबहिं
 
दीपक भारतदीप
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स्त्रियाँ हँसीं और चम्पक फूल गया (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

साहित्य के अन्तर्गत ’कवि-समय’ का अध्ययन करते हुए अन्यान्य कवि समयों के साथ ’वृक्ष-दोहद’ का जिक्र पढ़कर सहित्य की विराटता देखी । वृक्ष-दोहद का अर्थ वृक्षों में पुष्पोद्गम से है । यूँ तो दोहद का अर्थ गर्भवती की इच्छा है, पर वृक्ष के साथ इस दोहद का प्रयो
 
हिमांशु । Himanshu
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चाणक्य नीति-संतोष सबसे बड़ा धन है

संतोषस्त्रिशु कत्र्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कत्र्तव्योऽध्ययने तपदानयोः।। हिंदी में भावार्थ- मनुष्य को अपनी पत्नी, भोजन और धन से ही संतोष करना चाहिये पर ज्ञानार्जन, भक्ति और दान देने के मामले में हमेशा असंतोषी रहे यही उसके लिये अच्छा है।
 
दीपक भारतदीप
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हार गया तन भी, डूब गया मन भी ।

समय की राह से हटा-बढ़ा कई बार विरम गयी राह ही, मन भी दिग्भ्रांत-सा अटक गया इधर-उधर । भ्रांति दूर करने को दीप ही जलाया था ज्ञान का, विवेक का, देखा फिर खो गयीं संकीर्णतायें व्यष्टि औ’ समष्टि की । स्व-प्राणों के मोह छोड़ सूर्य ही सहेजा था उद्भासित हो बैठी
 
हिमांशु । Himanshu
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सभ्यताएँ जंगलों का अनुसरण करती रही हैं

सदा स तीर्थो भवति सदा दानं प्रयच्छति सदा यज्ञं स यजते यो रोपयति पादपम् ।" By Planting a single tree one gets as much 'punya' in life as residing eternally in a famous Tirth; always giving 'danas' and always performing Vedic sacrifices. वृक्षों की जीव
 
हिमांशु । Himanshu
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बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को

बस आँख भर निहारो मसलो नहीं सुमन को संगी बना न लेना बरसात के पवन को । वह ही तो है तुम्हारा उसके तो तुम नहीं हो बेचैन कर रहा क्यों समझा दो अपने मन को । न नदी में बाँध बाँधो मर जायेगी बिचारी कितनी विकल है धारा निज सिन्धु से मिलन को । तूँ पुकारता चला चल
 
हिमांशु । Himanshu
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संत कबीर वाणी-कुतिया ही चोरों से मिल जाये तो कौन पहरा देगा

खट्टा मीठा चरपरा, जिभ्या सब रस लेय। चोरों कुतिया मिलि गई, पहरा किसका देय।। संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हमारी जीभ खट्टा, मीठा और चटपटा सब प्रकार के रसों का स्वाद लेती है ऐसे में उससे यह कैसे आशा की आये कि वह किसी को बुरा कहेगी। यह ऐसा ही है जैस
 
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विदुर नीतिः जातीय बंधु जीवन की नैया पार लगायें तो डुबोयें भी

श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति। दिग्धहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति।। हिंदी में भावार्थ -जिस तरह मृग विषैला बाण हाथ में लिये शिकारी के पास पहुंचकर कष्ट पाता है वैसे ही मनुष्य अपने धनी बंधु के पास कष्ट पाता है। वह धन देने से इंकार कर दे तो
 
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शत्रु और मित्र की पहचान करें

भोगप्राप्तं विकुर्वाणं मित्रमप्युपपीडयेत्। अत्यंतं विकृतं हन्यात्स पापीया् रिपुर्मतः।। हिंदी में भावार्थ- जो मित्र भोगों में लिप्त होते हुए भी उपकार करने वाला है तो भी वह पीड़ा देता है। अगर वह अपकार करने वाला है तो उसे अपना शत्रु ही समझते हुए उसे दंडि
 
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-दुष्ट धनवान राज्य के लिये अग्नि के समान

आस्रावयेदुपचितान् साधु दुष्टऽव्रणनि। आमुक्तास्ते च वतैरन् वह्मविव महीपती।। हिंदी में भावार्थ- दुष्ट व्रणों की तरह पके हुए धन से संपन्न असाधु पुरुष को निचोड़ लेना ही ठीक है वरना वह दुष्ट स्वभाव वाले अग्नि के समान राज्य के साथ व्यवहार कर उसे त्रस्त करते
 
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चाणक्य नीति-दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला समझें

यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी। स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।। हिंदी में भावार्थ- नीति विशारद चाणक्य के अनुसार कुछ पुरुषों में विवेक नहीं होता और वह सुंदर स्त्री से व्यवहार करते हुए यह भ्रम पाल लेते हैं कि वह वह उस पर मोह
 
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मनुस्मृतिः गुरु शिष्य के बीच से बिल्ली निकल जाये तो विद्याध्ययन नहीं करना चाहिये

द्वावेव वर्णयेन्नित्यमनध्यायो प्रयत्नतः। स्वाध्यायभूमिंचाशुद्धामात्मानं चाशुचिंतद्विजः।। हिंदी में भावार्थ- जो स्थान पवित्र और शुद्ध नहीं है वहां अध्ययन नहीं करना चाहिये। उसी तरह स्वयं शुद्ध हुए बिना भी व्यक्ति को अध्ययन नहंी करना चाहिये। शुद्ध और पव
 
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मनुस्मृतिः दंड के ही भय के लोग कर्तव्योन्मुख होते हैं

सर्वो दण्डजितो लोके दुर्लभो हि शुचिर्नरः। दण्डस्य हि भयात्सर्व जगद् भोगाय कल्पते।। हिंदी में भावार्थ- इस विश्व में राज्य दंड के भय से ही लोग नियम तथा कानून मानते हैं। ऐसे व्यक्ति बहुत कम हैं जो जो स्वभाव से ही पतित्र हों वरना अधिकतर लोग तो दण्ड के भय
 
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चाणक्य नीतिः मनुष्य अपने कर्म के लिये अकेला ही उत्तरदायी होता है

जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्। नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्।। हिंदी में भावार्थ- मनुष्य अकेला ही जन्म लेकर मुत्यु को प्राप्त होता है। अपने हाथ से ही अकेले शुभ अशुभ कर्म करता है और अपने पाप पुण्य का फल अकेले ही भोगता और मोक्ष प्र
 
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चाणक्य नीतिः खाने पीने के विषय में कतई संकोच न करें

धन-धान्यप्रयोगेषु विद्य-संग्रहणेषु च। आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्। हिंदी में भावार्थ- धन धान्य के व्यवहार, ज्ञान विद्या के संग्रह और खाने पीने में जो व्यक्ति संकोच या लज्जा नहीं करते वही जीवन में सुखी रहते हैं। अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्
 
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