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व्यक्तित्त्व और आदर्शवादिता

प्रत्येक व्यक्ति के अन्तः में उसके दो स्वरुप उपस्थित होते हैं - एक वह जो वह वास्तव में होता है, तथा दूसरा वह जो वह होना चाहता है. प्रथम स्वरुप उसकी परिस्थितियों पर निर्भर करता है जबकि दूसरा उसके आदर्शों पर. इन दोनों स्वरूपों में अंतराल हो सकता है क्योंकि
 
देवसूफी राम कु० बंसल