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उम्मीदों की फसल फिर-फिर बो रही हैं मंज़िलें. [गीतिका] - आचार्य संजीव वर्मा

उम्मीदों की फसल फिर-फिर बो रही हैं मंज़िलें.साँझ को सोईं सुबह मुँह धो रही हैं मंज़िलें..रचनाकार परिचय:-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी.ई., एम.आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम.ए., एल.एल.बी., विशारद,
 
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कहते पर्यायोक्ति में, घुमा-फिराकर बात [काव्य का रचना शास्त्र : ४५] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"

कहते पर्यायोक्ति में, घुमा-फिराकर बात.कवि की चतुराई करे, कविता जग-विख्यात..रचनाकार परिचय:-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी.ई., एम.आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम.ए., एल.एल.बी., विशारद, पत्रकारिता में
 
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परिकर अलंकार [काव्य का रचना शास्त्र: ४४] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"

साभिप्राय जब विशेषण का कवि करे प्रयोग|अलंकार परिकर वहाँ, रुचिकर हो संयोग||रचनाकार परिचय:-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी.ई., एम.आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम.ए., एल.एल.बी., विशारद, पत्रकारिता में
 
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समासोक्ति [काव्य का रचना शास्त्र: ४४] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"

रचनाकार परिचय:-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी.ई., एम.आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम.ए., एल.एल.बी., विशारद, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है।आपकी प्रथम प्रकाशित कृति
 
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