उम्मीदों की फसल फिर-फिर बो रही हैं मंज़िलें. [गीतिका] - आचार्य संजीव वर्मा
उम्मीदों की फसल फिर-फिर बो रही हैं मंज़िलें.साँझ को सोईं सुबह मुँह धो रही हैं मंज़िलें..रचनाकार परिचय:-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी.ई., एम.आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम.ए., एल.एल.बी., विशारद,
Jan 22 2010 12:17 PM



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