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आचार्य…

” उध्या जर माझी समाधी बांधायची झाली तर त्यावर एकच वाक्य लिहा- हा माणूस मुर्ख असेल,हयाच्या हातुन अनेक चुका झाल्या असतील ; पण हा कॄत्घन मात्र कधीही न्वहता.” गेल्या आठवड्य़ातच वि.र.काळे हयांच ’आचार्य अत्रे : महाराष्ट्रातील बलदंड व्यक्तीमत्व’ हे
 
देवेंद्र चुरी
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सुख और आनंद मे भेद

ईश्वर, जीव, प्रकृति ये तीन अनादि तत्त्व हैं। इनमे प्रकृति सत् अर्थात सत्तात्मक अनादि तत्व है जो सृष्टि का उपादान कारण और जड़ स्वरुप है। जीव सत्  और चित् अर्थात चेतन सत्ता है जिसके इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दु:ख, और ज्ञानादि गुण हैं। ईश्वर
 
आचार्य धनंजय शास्त्री