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घर और महानगर

घर (१.) शाम ढलते ही पंछी लौटते हैं अपने नीड़ लोग अपने घरों को, बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़ पर वो क्या करें ? जिनके घर हर साल ही बसते-उजड़ते हैं, यमुना की बाढ़ के साथ. (२.) चाह है एक छोटे से घर की जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो, ताकि हवाएँ
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अकेला मन

मन था आज अकेलाचला आज दूर तकमन को बाधेक्यो किआज मन थाबहका बहकामन तोड़ चलासारे बंधनउड़ने लगा आजमनछुने की तमन्ना थीआज सारा आकाशमन तोड़ चलासारे बंधन
 
धीरज शाह
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