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माओवाद पर जारी बहसः ईपीडब्ल्यू से साभार

कुछ माह पहले मंछली रिव्यू की वेबसाइट पर बर्नार्ड डिमेलो का एक लंबा आलेख छपा था, जिसे बाद में इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली ने संपादित करके छापा, जिसके डिमेलो उप संपादक भी है. ईपीडब्ल्यू में प्रकाशित होने के बाद इस आलेख पर मॉन्ट्रियाल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ
 
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हर किसी को चाहिए अपने-अपने नायक

दिलीप मंडलदिल्ली की सबसे ऊंची इमारत का नाम जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखा गया है। ये इमारत दिल्ली नगर निगम की है और इस समय दिल्ली नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी का बहुमत है। इसलिए माना जा सकता है कि बीजेपी जिन लोगों से प्रेरणा लेती
 
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संसद की बातें और युद्ध का सच

अनिल चमड़ियालाल कृष्ण आडवाणी ने नवंबर 1999 में जब ये कहा कि आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए सैनिक बलों की संख्या पर्याप्त नहीं है तो राज्यसभा में इस बाबत एक सवाल किया गया।तब सरकार ने जवाब दिया था कि इस समय जम्मू कश्मीर में मिलिटेंसी से
 
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विकास की छड़ी नहीं है जनगणना

साल दर साल ये आंकड़े आ रहे हैं कि दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाकी समुदायों से पीछे रह जा रहे हैं। लेकिन इस सूचना का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक कि सरकार सचेत रूप से इन समुदायों के हित में काम न करे और
 
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एक विस्थापित का अविश्वास प्रस्ताव

देश का शासक वर्ग अपनी सीमाओं के भीतर एक और युद्ध लड़ रहा है. कारपोरेट कंपनियों, औपनिवेशिक स्वामियों और उनके दलाल देशी पूंजीवादी घरानों के हित में लड़ी जा रही यह लड़ाई पिछले छह महीनों से अधिक समय से लड़ी जा रही है. ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से चल रहा यह
 
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दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है भारत का लोकतंत्र

अरुंधति राय के इस साक्षात्कार के बारे में हम पहले भी एक पोस्ट में लिख चुके हैं. पेश है यह पूरा साक्षात्कार. आप इसे यहां सुन सकते हैं और चाहें तो डाउनलोड भी कर सकते हैं.
 
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सेहत की आड़ में सेहत से खिलवाड़

कैंसर से बचाने के लिए हजारों गरीब बच्चियों को एक विवादित टीका लगाया जा रहा है और ऐसा करने के लिए सरकार, कंपनियां और गैरसरकारी संगठन नियम-कायदों की धज्जियां उड़ा रहे हैं. शांतनु गुहा रे और कुणाल मजूमदार की रिपोर्ट नागेश्वर और वेंकटम्मा से जब कोई सरिता के
 
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विदेशी कंपनियां, दलाल व्यवस्था और गिरवी संप्रभुताः दो आख्यान

अभी संवाद प्रकाशन से आई मिशेल चोस्दुव्स्की की गरीबी का वैश्वीकरण पढ़ रहा था. पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के कसते शिकंजे की एक पड़ताल करने की कोशिश की है मिशेल ने. हालांकि उनके लेखे-जोखे में कुछ खामियां और गलतियां भी हैं, लेकिन कुल मिला कर एक शानदार और
 
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चिंताएं, संविधान और सामाजिक विकास का यथार्थ

अनिल चमड़ियासंविधान में जो व्यवस्थाएं हैं उनकी व्याख्या विभिन्न विचारों वाली राजनीति अपने तरीके से कर सकती है. लेकिन संविधान से अलग कोई व्यवस्था करने का आश्वासन या भरोसा कोई राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देता है तो उसके दो ही मकसद हो सकते हैं. एक
 
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आदिवासी और माओवादी एक तरफ हैं और राजसत्ता दूसरी तरफ

‘पुलिस दुश्मन के साथ है’क्रांतिकारी कवि और विचारक वरवर राव बता रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में पुलिस कैंप पर हमला ऑपरेशन ग्रीन हंट के बदले में किया गया था. तहलका में प्रकाशित शोभिता नैथानी से बातचीत से अंश, साभार.पश्चिम बंगाल में जवानों की निर्मम हत्या पर
 
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भारत की क्षेत्रीय नीति में सुधार की जरूरत

प्रफुल्ल बिदवईपाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में, जो ऐसे देश हैं जहां अशांति फैली हुई है और जो भारत की सुरक्षा पर काफी बडा असर डाल सकते हैं. क्या भारत की कोई निश्चित और संगत नीति है? हाल में जो घटनाएं घटी हैं, उन्हें देखते हुए इस सवाल का ईमानदार जवाब
 
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एक दमनकारी होते राज्य में जनता का प्रतिरोध और साहित्य की जिम्मेदारियां

तद्भव का यह संपादकीय अपने आप में एक पूरी टिप्पणी है. हाशिया पर साभार.इन दिनों राज्य के दमनकारी चरित्र को लेकर विचार मंथन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। नक्सलवाद के सफाये के नाम पर बेकसूर और मुफलिस लोगों पर राज्य का कहर इसका ताजा और ज्वलंत उदाहरण है। यह एक
 
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मुझे निष्कासित नहीं करने का कारण बताए प्रशासन

दिलीपयह हिंदी विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का दुर्भाग्य है कि उनके पास अपनी बात रखने का ज़्यादा विस्तृत आयाम विश्वविद्यालीय मंच के बजाए मीडिया मुहैया कराती है.  मैं इसे दुर्भाग्य इसलिए मान रहा हूँ क्योंकि मीडिया के जरिए यहाँ की सहमति-असहमति
 
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विभूति नारायण राय और विश्वरंजन में क्या फर्क है

इस पोस्ट के ज़रिये हम मांग करते हैं अनिल चमडिया की फिर से बहाली की जाए, और उनसे माफी भी माँगी जाए. इसी जगह पर यह विचार भी करना चाहिए कि वीएन  राय और विश्वरंजन में क्या कोइ फर्क नहीं है? वर्धा से जब कुछ छात्रों ने फोन किया कि अनिल चमड़‍िया सर को
 
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साहित्य, समाज और नागरिक चेतना के चंद सवाल

एक लोकतांत्रिक समाज का नागरिक होने के नाते हम नागरिक चेतना, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों और लेखकीय दायित्व के भव्य सवालों के समक्ष खुद को पाते हैं। इसमें नागरिक कहां खड़ा है? लेखन क्या है? नागरिक चेतना और लेखन के आपसी सम्बंध क्या हैं? हमारे अपने समाज में
 
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...क्योंकि वह अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं है

नोबेल पुरस्कार ने शांति को लेकर ओबामा की वचनबद्धता को इतना मजबूत किया है कि अफगानियों के लिए उन्हों ने और अधिक सैनिक भेज दिए हैं. क्या है ये नोबेल की राजनीति और उसका अर्थशास्त्र, बता रहे हैं फिदेल कास्त्रो. अनुवाद साथी अभिषेक श्रीवास्तव का है.एक नस्ली
 
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माओ के बाद का चीन : मिथक और यथार्थ

चीन की आर्थिक वृद्धि की दर सबको लुभा रही है. लेकिन चीन के पिछवाड़े में क्या है, यह जानने की कोशिश की है टी जी जैकब और पी बंधू ने इस लेख में. इस आलेख का अनुवाद किया है अभिषेक श्रीवास्तव ने. जल्दी ही हम चीनी मामलों के विशेषज्ञ राबर्ट वेल से हाशिया और
 
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उदार आर्थिक नीति के युग में कांग्रेस

प्रभाकर चौबेभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश की ''आधुनिक'' पार्टी है। भारतीय पुनर्जागरण के दौर में जब औद्योगिक क्रांति की हवा देश में मंद-मंद बहने लगी और यहां औद्योगीकरण अपने उदय की आहट दे रहा था उस काल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ।इस तरह अपना
 
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कोपेनहेगन में आखिर क्या हुआ?

फिदेल कास्त्रो(अनुवाद : अभिषेक श्रीवास्तव)युवा किसी से भी ज्यादा भविष्य के बारे में दिलचस्पी लेते हैं। हाल-फिलहाल तक जो बातें होती थीं, उसमें इस पर चर्चा होती थी कि हमें किस किस्म का समाज चाहिए। आज सारी चर्चा इस बात पर होती है कि क्या इंसानी समाज बच
 
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असल मुद्दा है गरीबी खत्म करने का

शिवानंद तिवारीतेलंगाना के बहाने राज्यों के पुनर्गठन का सवाल एक बार फिर केंद्र में आ गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वक्त की नजाकत को समझते हुए ढुलमुल जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि इस मसले पर ठंडे दिल से विचार किया जाएगा। प्रधानमंत्री के कथन के
 
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विकास की प्राथमिकताओं की अनदेखी

अवधेश कुमारइस समय भारत की स्थिति पर नजर दौड़ाई जाए तो अंदर और बाहर उसकी परस्पर विरोधी और बेमेल तस्वीर नजर आती है। हम इस पर आत्ममुग्ध हो सकते हैं कि इन दिनों दुनिया के विकसित देश भारत को अकल्पनीय महत्व दे रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री को जलवायु सम्मेलन में
 
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बुद्धिजीवियों, चिंतकों, कलाकारों, साहित्यकारों और लेखकों के नाम अपील

बस्तर पर हमने सामग्री प्रस्तुत करने का वादा किया था. इस कड़ी में यह अपील, जो आपरेशन ग्रीन हंट की मुखालिफत करने की पुरजोर अपील के साथ बस्तर और छत्तीसगढ़ के लोगों द्वारा किये गए कुछ रचनात्मक कार्यों का ब्यौरा देती है. इसे पंजाबी के लेखक-पत्रकार सतनाम ने
 
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ऑपरेशन ग्रीनहंट: जनता के खिलाफ जंग

प्रफुल्ल बिदवईजो कुछ मीडिया में कहा जा रहा है, यदि वह सही है तो श्री मधु कोडा ने दो वर्ष तक झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर काम करने के दौरान 4000 करोड रुपए की विपुल धनराशि गैरकानूनी ढंग से एकत्रित की और उसे दुनिया भर में अलग-अलग परिसंपत्तियों में निविष्ट
 
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मिड डे मील में डिब्बाबंद : किसको होगा फायदा

सरकार स्कूलों में मध्याह्न भोजन की जगह डिब्बाबंद भोजन की आपूर्ति करने की सोच रही है. पिछले कुछ समय से मिड डे मील खाने से बच्चों के बीमार पड़ने की घटनाएँ हो रही हैं. सवाल ये उठता है कि मिड डे मील परियोजना को सरकार क्यों बदलना चाहती है? परियोजना बदलने क
 
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उपन्यास अंश : ग्लोबल गांव के देवता

साथी रणेंद्र से इस उपन्यास के बारे में लम्बे समय से चर्चा होती रही है. जिस मोड़ से हमारा देश गुजर रहा है-अगले पांच वर्षों में बहुत कुछ हो जाने की संभावनाएं-आशंकाएं सामने आ रही हैं. जिस तरह से कारपोरेट जगत भारत की दलाल सत्ता व्यवस्था की मदद से हमारा स
 
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'सभ्य' समय में 'असुरों' की पीड़ा-'असुरों' का संघर्ष

विष्णु राजगढ़िया भारतीय ज्ञानपीठ ने इसी महीने रणेंद्र का उपन्यास प्रकाशित किया है- ग्लोबल गांव के देवता। सिंगूर, लालगढ़, सलवा जुड़ुम और आपरेशन ग्रीन हंट के इस दौर में यह उपन्यास आधुनिक भारत में जनजातियों के लिए उत्पन्न अस्तित्व-मात्र के संकट के साथ ही ज
 
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आदिवासी सरकार को दुश्मन और नक्सलियों को दोस्त मान रहे हैं

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छात्रों की दीवाल पत्रिका दख़ल की दुनिया ने आपरेशन ग्रीन हंट के परिप्रेक्ष्य में दंतेवाडा में कार्यरत गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार को बोलने के लिए आमंत्रित किया. प्रस्तुत है इस कार्यक्रम में हिम
 
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4 दिसंबर, राजेंद्र भवन, आइटीओ के नजदीक, दिल्ली : याद रखें आपको आना है

दांव पर हैं एक बेहतर समाज और जीवन की आकांक्षा  आपरेशन ग्रीन हंट के नाम से जनता के खिलाफ युद्ध देश के अनेक इलाकों में शुरू हो चुका है. मीडिया में भले इसकी खबरें नहीं आ रही हों, उन इलाकों से आनेवाले अनेक लोग-जैसेकि फिल्मकार गोपाल मेनन-बताते हैं कि
 
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देश के कानून छत्तीसगढ मे लागू नही

हमने सुना कि गृहमंत्री चिदंबरम छत्तीसगढ़ में जनसुनवाई करने जा रहे हैं. वैसे इस राज्य को जनसुनवाइयों का खूब अनुभव है. यहाँ जिस तरह की जनसुनवाइयां होती रही हैं, हाशिया पर उनके बारे में पहले भी लिखा जा चुका है. ‘जन चेतना’ ऐनवायरमेंट सपोर्ट ग्रुप के
 
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क्या आप छत्तीसगढ को नागालैंड बनाना चाहते है

हालाँकि शुभ्रांशु चौधरी की यह रिपोर्ट कुछ समय पहले की है, लेकिन यह हमें बताती है कि नक्सलवाद को सैनिक ताकत से ख़त्म करने की कोशिशों के नतीजे क्या होते होते हैं.  नक्सली हिंसा की वारदातों की कुल संख्या के मामले में पिछले साल पहली बार छत्तीसगढ का
 
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लोकतंत्र में सैन्य शक्ति : जनवाद और हिंसा का सवाल

भ्रम जीतनी जल्दी टूट जाये उतना अच्चा रहता है. संसदीय लोकतंत्र को अंतिम और सबसे बेहतरीन व्यवस्था मानाने वालों को यह दिखाई नहीं देता की लोकतंत्र का यह रूप अप्निजनता के खिलाफ कितना हिंसक और सैन्य शक्ति से लैस होता जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ब
 
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अंतिम राजकीय तर्क

युद्ध झेल रही आपने देश की जनता के नाम स्तेफान स्पेंडर की एक कविता. यह शानदार अनुवाद अनिल एकलव्य का है. उनके ब्लॉग से साभार.  स्तेफ़ान स्पेंडर बंदूकें धन के अंतिम कारण के हिज्जे बताती हैं बसंत में पहाड़ों पर सीसे के अक्षरों में लेकिन जैतून के पेड
 
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लोकतंत्र और शांति के नाम पर गरीबों के बेहतर विकल्प की हत्या

अगर आप नोम चोम्स्की के इस आलेख को भारत में सरकार और मीडिया द्वारा किये जा रहे उन्मादी प्रचार के साथ जोड़ कर देखें तो पाएंगे कि अहिंसा और लोकतंत्र का पाखंड रचने में भारत आपने स्वामी अमेरिका से पीछे नहीं है. किस तरह हिंसा खत्म करने के नाम पर यह दे
 
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नक्सलवाद को समस्या और आंदोलन के रूप में देखने का नजरिया

अनिल चमड़िया मनमोहन सिंह जब से देश के प्रधानमंत्री बनें है तब से वे इस बात को कई बार दोहरा चुके हैं कि नक्सलवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है। साठ के दशक के अर्थशास्त्री मनमोहन सिह भी शिक्षण संस्थानों में डिग्री लेने वाले देश के दूसरे बुद्धिजीवियों की
 
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नक्सलवाद के नाम पर असहमतियों को निशाना

देवाशीष  प्रसून    नक्सलवाद के नाम पर सरकार तमाम तरह की असहमतियों के स्वर पर निशाना साध रही है। सरकारें कुछ ऐसे चीजों का हौव्वा बना कर रखती हैं जिन्हें वो किसी भी गंभीर असहमति या असहमति से उपजे प्रतिरोध के स्वर के विरोध में खड़ा कर सकें
 
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प्रधानमंत्री आदिवासियों से माफ़ी मांगें

यह हमारे समय का एक विकट यथार्थ है कि एक तरफ प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य और (खुद अपने ही शब्दों में) देश के मोस्ट वांटेड नंबर दो किशन जी और दूसरी तरफ दंतेवाडा में गाँधीवादी संस्था 'वनवासी चेतना आश्रम' से जुड़े प्रख्यात गांधीवा
 
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सुजातो भद्र को जंगल महल से किशन जी का जवाब

अपने लालगढ़ आन्दोलन और हिंसा के मुद्दे पर मानवाधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र का माओवादियों के नाम एक खुला पत्र पढ़ा. अब पढिये जंगलमहल से किशनजी का जवाब, जो कोलकाता के  दैनिक स्टेट्समैन में 10 अक्टूबर को छपा था. किशनजी भाकपा (माओवादी) के पोलित
 
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सत्ता तंत्र और माओवाद से निपटने के तरीके

चन्द्रिका पी . चिदम्बरम को मैं भाषा और शब्दों के मायने समझाने की जुर्रत नहीं कर सकता. क्योंकि हमारे और उनके बीच में बहुत बडा फर्क है. क्योंकि वे एक राष्ट्र के शीर्ष पद पर हैं और मैं एक राष्ट्र की तलाश में, बिना राष्ट्र का नागरिक. मैं उनकी मजबूरी भी स
 
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