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अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ "यौन मुक्ति" नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है -- इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया. : विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन
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क्या करेगी कांग्रेसी सरकार

केंद्र सरकार ने तेलंगााना राज्य के गठन के लिए हरी झंडी दिखाकर एक ओर जहां क्षेत्र के लोगों के चेहरों पर खुशी बिखेरी है, वहीं देश के बाकी हिस्सों में भी अलग राज्य की मांग कर रहे लोगों की उम्मीदें जगा दी हैं। हालांकि बाकी मांगों पर केंद्र का रुख क्या रह
 
सुभाष चन्द्र
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गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी.
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होन्डुरस की घटनाओं ने खोली बुर्जुआ लोकतंत्र की पोल

स्पष्ट है कि यह प्रतिरोध मेहनतकश वर्ग चरित्र धारण किये हुए है. देश के उपरी तबके की बहुसंख्या तख्तापलट के पक्ष में हैं लेकिन वे कुल जनसँख्या के मुकाबले में अल्पसंख्यक हैं. निचले तबके के लोग बहुसंख्या में हैं. उनकी तादाद ६५ प्रतिशत है. वे गरीबी में जी
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भगत सिंह, कम्युनिस्ट और गाँधी होने का मतलब

पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा जानबूझकर परंतु कुछ पढ़े-लिखे लोगों द्वारा अनजाने में भावुकतावश यह प्रचारित किया जाता है कि गाँधी और भगत सिंह, दोनों आज़ादी के दीवाने थे. उनका मकसद इस देश को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति दिलाने तक सीमित था. ले
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शिक्षक नशेड़ी, गंजेड़ी हैं तो क्या पत्रकार संत हैं?

नवनियोजित शिक्षकों के आन्दोलन की खबरें बिहार के अखबारों में ‘प्रभात खबर’ ने सबसे शानदार तरीके से छापीं लेकिन ‘सुशासनी।’ डांट से अब ये ‘उल्टी गंगा बहाने’ लगे हैं। अनुराग कश्यप, दर्शक (लेखक हैं तो बुर्के में क्यों हैं?) और सुरेन्द्र किशोर इन शिक्षकों को
 
राजू रंजन
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दलितों के लिए खतरा बन रहे दलित नेता

श्रीराजेश- वर्तमान समय में दलित आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए एक रास्ता चुनना होगा, सिर्फ एक. इस आंदोलन को जहां एक ओर इस समुदाय के बुद्धिजीवी अपनी ऊर्जा से मुकाम तक पहुंचाने के लिए लगे हैं, वहीं दलित जनता के तथा
 
Srirajesh
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हम अब भी लालगढ़ में हैं – चत्रधर महतो

हम अब भी लालगढ़ में हैं, ऐसा कहना है लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) के आदिवासी नेताओं का. मंगलवार, 30 जून को आन्दोलनकारी आदिवासी नेता चत्रधर महतो ने इस बात से इंकार किया कि वह लालगढ़ छोड़कर भाग गया है. उसने कहा कि वह अभी भी पश्चिमी बंगाल के इस अशांत इलाके में
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बुर्जुआ समाज के अंतरविरोध और सर्वहारा द्वारा इनका उपयोग

कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां बुर्जुआ वर्ग की कतारों के बीच विरोध, पूंजीपति वर्ग के विभिन्न धडों के बीच अनबन, भूस्वामियों और औद्योगिक सम्पत्तिधारकों के बीच संघर्ष, एक ओर वित्तीय हितों के प्रतिनिधियों और दूसरी ओर
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नई समाजवादी क्रान्ति का उद्घोषक ‘बिगुल’ के मई-2009 अंक की विषय – सामग्री

मज़दूर वर्ग के लिए सबसे बुरी बातों में से एक शायद यह है कि मई दिवस को आज एक अनुष्ठान बना दिया गया है। यह मई दिवस के महान शहीदों का अपमान है। मई दिवस मज़दूरों के मक्कार, फरेबी, नकली नेताओं के लिए महज़ झण्डा फहराने, जुलूस निकालने, भाषण देने की एक रस्म
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मई दिवस अनुष्ठान नहीं, संकल्पों को फौलादी बनाने का दिन है! ..अंतिम किश्त

उपरोक्त संक्षिप्त चर्चा के आलोक में मज़दूर साथियों के लिए यह समझना कठिन नहीं होना चाहिए कि मई दिवस की परम्परा आज भाँति-भाँति के नकली वामपन्थी मदारियों के हाथों किस कदर लांछित और कलंकित हो रही है। मई दिवस दुनिया के मज़दूरों के राजनीतिक चेतना के युग मे
 
Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar