अवघट-२
तुम्हारी गुनगुनाहट, तुम्हारा नाद और तुम। कितनी चोटें हैं मेरे पास तुम्हारी दी हुई। तंबूरे के एक एक तार के साथ चुभते हो सूल की तरह। और कोई रास्ता ना मिला तो शब्द बनकर आये। मैं अब शांत हूं और चुप भी। कितनी आसानी से कह दिया कि ये देखो ''शब्द की चोट''!! तुम
Oct 19 2008 02:47 AM



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