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अवघट-२

तुम्हारी गुनगुनाहट, तुम्हारा नाद और तुम। कितनी चोटें हैं मेरे पास तुम्हारी दी हुई। तंबूरे के एक एक तार के साथ चुभते हो सूल की तरह। और कोई रास्ता ना मिला तो शब्द बनकर आये। मैं अब शांत हूं और चुप भी। कितनी आसानी से कह दिया कि ये देखो ''शब्द की चोट''!! तुम
 
Gopal Singh
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अवघट-१

कबीर एक खोज है एक ऐसी यात्रा जिसका ना कोई पड़ाव और ना कोई मंजिल। मंजिल या तो जाने के लिए होती है या पाने के लिए लेकिन यह तो एक अनजाना सा अनुभव है जिसका होना ही भीतर एक गुदगुदी पैदा करता है। एक ऐसी उर्जा जो अपने भीतर करोड़ों छिद्रों से होती हुई आपको तड़पने
 
Gopal Singh
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