'फसाना-ए-शब-ए-ग़म'
'फसाना-ए-शब-ए-ग़म'----------------------ज़ुर्म-ए-तमन्ना की सज़ायूँ मिला करती है मुझे ,खिंचती हैं रंगे पलकों की,जब दर्द कफस में अंगड़ाईयाँ लेता है,सर्द आहों में दम तोड़ती हैं उम्मीदें,नक्श ज़हन में उभरने लगते हैं,परत दर परत उघड़ती हैं सब यादें,होने लगती
Jan 11 2010 07:34 AM



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