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'फसाना-ए-शब-ए-ग़म'

'फसाना-ए-शब-ए-ग़म'----------------------ज़ुर्म-ए-तमन्ना की सज़ायूँ मिला करती है मुझे ,खिंचती हैं रंगे पलकों की,जब दर्द कफस में अंगड़ाईयाँ लेता है,सर्द आहों में दम तोड़ती हैं उम्मीदें,नक्श ज़हन में उभरने लगते हैं,परत दर परत उघड़ती हैं सब यादें,होने लगती
 
अल्पना वर्मा
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'आभासी रिश्ते' और 'तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर'

वास्तविक जीवन में यूँ तो हर रिश्ते की अपनी एक पहचान होती है उनकी एक नज़ाकत होती है ,अधिकार और अपेक्षाओं से लदे भी होते हैं .एक कहावत भी है 'जो पास है वह ख़ास है'.यथार्थ से जुड़े और जोड़ने वाले इन रिश्तों से परे होते हैं -कुछ और भी सम्बन्ध !जो होते हैं कुछ
 
अल्पना वर्मा
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किशोर दा के साथ- कश्ती का खा़मोश सफ़र -

अभी परसों ही हमारे लाडले , मस्ताने ,ऒल राउंडर कलाकार , गायक किशोर दा की पुण्य तिथी थी. १३ अक्टूबर १९८७ को वे हमको दर्द भरा अफ़साना सुना कर हमेशा के लिये इस ज़िंदगी के सुहाने सफ़र को खत्म कर के कहीं दूर चले गये. दूर गगन के इस राही नें, इस मुसाफ़िर नें
 
दिलीप कवठेकर
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जाने क्या चाहे मन?

'जाने क्या चाहे मन बावरा' -एक फ़िल्मी गीत की पंक्तियाँ हैं..सुनती हूँ तो सोचती हूँ कि आखिर यह मन है क्या?किसकी परिभाषा मानी जाये..एक मनोचिकित्सक की?या 'कथित मनोरोगी' की?दोनों ही अपने ढंग से इस मन को समझते और समझाते हैं..मैं तो मन को एक पिक्चर puzzle मानती
 
अल्पना वर्मा
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'तुम्हारी प्रिया हूँ'

पिछले कुछ दिनों से समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं?यूँ तो ब्लॉग पर सूचना पट लगा दिया था कि ब्रेक टाइम है!कुछ परिस्थितियां भी ब्लॉग लेखन के लिए अनुकूल नहीं हो पा रही थीं.ब्लॉग की दुनिया में महीने भर से मेरी अनियमितता बनी हुई थी.अब स्थिति सामान्य हुई है
 
अल्पना वर्मा
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'आस-एक गीत'

३० अगस्त हमारे बच्चों के स्कूल खुल गए.दूसरे सत्र की पढ़ाई शुरू हो गयी.सरकारी स्कूलों में ईद तक की छुट्टी है ही..लोग जो छुट्टी गए थे वापस आ गए हैं ,फिर से पुरानी चहल पहल और रौनक लौट आई..गरमी का वही बुरा हाल है..तापमान दो दिन पहले भी ५० से ऊपर था. स्वाईन
 
अल्पना वर्मा
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रक्षा बंधन - ब्लोग परिवार की अलग और विशिष्ट संस्कृति

(मेरी बहन प्रतिभा नें भेजी हुई राखी!!)रक्षा बंधन के इस पावन और पुनीत पर्व पर ब्लोग परिवार की सभी बहनों को शुभकामनायें, बधाई, और इस भाई की ओर से प्रणाम!!ब्लोग दुनिया से जुडने के एक साल के बाद जब भी मैं आज पीछे मुड कर देखता हूं तो पाता हूं कि इस नई विधा
 
दिलीप कवठेकर