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अमृत प्यार

अमृत प्यार माँ के प्यार की महिमा का, करता हूँ गुणगान, कभी कमी न प्यार में होती, कैसी है यह खान . कष्ट जन्म का सहती है, फिर भी लुटाती जान, सीने से चिपकाती है, हो कैसी भी संतान . छाती से दूध पिलाती है, देती है वरदान, पाकर आंचल की छांव, मिलता है सुख बड़