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पसीने की धारा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें
कभी मेरे बहते हुए पसीने पर तुम तरस न खाना, यह मेरे इरादे पूरे करने के लिये बह रहा है मीठे जल की तरह, इसकी बदबू तुम्हें तब सुगंध लगेगी जब मकसद समझ जाओगे। सिमट रहा है ज़माना वातानुकुलित कमरे में सूरज की तपती गर्मी से लड़ने पर जिंदगी थक कर आराम से सो जाती,
Jun 06 2010 10:43 PM



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