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Ajnabi

  उमाकांत मालवीयझण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही ।जीवित का तिरस्कार, पुजें मक़बरे,रीति यह तुम्हारी है, कौन क्या करे ।ताजमहल, पितृपक्ष, श्राद्ध सिलसिले,रस्म यह अभी नहीं, कभी थमी नहीं ।शायद कल मानव की हों न सूरतेंशायद रह
 
Rajey Sha
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शार्टकट कहीं नहीं ले जाता

सभी शार्टकट पर हैंजिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो मैकाले सम्मत पढ़ाई करोवैज्ञानि‍क, नेता, इंजीनियर, अभिनेता, विक्रेता बनोबेच दोआत्मा तक।ये आत्मा ही तो सबसे बड़ी परेशानी है।एक अजनबी बीवी ले आओअजनबी बच्चे पैदा करो    अजनबी रहो ताउम्र बहुत
 
Rajey Sha
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मेरी आरजू...कमीनी। मेरे ख्‍वाब भी....कमीने....।

एक छोटा सा तथ्य आदमी के चरित्र का सारा बखिया उधेड़ देता है। आज तक के मानवीय इतिहास में हमने देखा है कि कोई भी देश अपने सर्वश्रेष्ठ महानगरों में आधुनिकता और कृत्रिम सभ्यता ही नहीं, उस काल्पनिक नर्क को भी यथार्थ में पालता है जो कि कई धर्मों में सविस्तार
 
Rajey Sha
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1411 वो खूबसूरत, आकर्षक, चुम्‍बकीय, रोमांचक अहसास का चेहरा खो ना जाये, आओ इसे बचायें...

बाघ बचाओ, मि‍साल बनाओ।हमारा राष्ट्रीय वन्य जीव जिन्दगी और मौत के संघर्ष में झूल रहा है। एक मोटे अनुमान अनुसार 19वीं सदी में बाघों की आबादी 40,000 थी जो 20वीं सदी और अब तक घटते-घटते 1411 पर पहुंच गई है। इस हिसाब से बुरे आदमी की हवस और भले इंसानों की
 
Rajey Sha