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रिश्ता

अनामिका की एक कविता रिश्ता वह बिलकुल अनजान थी ! मेरा उससे रिश्ता बस इतना था कि हम एक पंसारी के ग्राहक थे नए मुहल्ले में । वह मेरे पहले से बैठी थी टॉफ़ी के मर्तबान से टिककर स्टूल के राजसिंहासन पर । मुझसे भी ज्यादा थकी दीखती थी वह फिर भी वह हँसी ! उस हँसी