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उदासी के भूरे चुभते कंबल में लिपटे दिन-रात

हरे पेड़ नंगे हो गए हैं, दो महीने पहले तक अधनंगे घूम रहे लोग लबादे लादे डोल रहे हैं. लाल, पीले, गुलाबी फूलों और हरियाली पर धूसर पेंट की बाल्टी उलट दी है किसी ने. यूरोप में सर्दी सांकल खड़का रही है. सड़क पर डाल से बिछड़े पत्तों का अंबार है जो ठंडी हवा
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उम्रेदराज़ के चारों दिन कटे

महीने भर की छुट्टी का महीनों से इंतज़ार था. बहुत सारे वादे-इरादे थे, अपनों से और अपने-आप से भी. दस साल से हर बार यही होता है, मंसूबे बनाए जाते हैं, कुछ पूरे होते हैं और ज्यादातर धरे रह जाते हैं. भारत से जाते हुए हर बार अजब सी कसक होती है, ये सोचकर कि