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"दिनकर"… एक बलंद आवाज ।

बढ़कर विपत्तियों पर छा जा, मेरे किशोर! मेरे ताजा! जीवन का रस छन जाने दे,तन को पत्थर बन जाने दे। तू स्वयं तेज भयकारी है, क्या कर सकती चिनगारी है?" राष्ट्रकवि 'दिनकर' विरचित ये पंक्तियाँ आम मानव में भी विशिष्टता का बोध कराने सकने में सक्षम है… विगत कुछ
 
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आगाज़ सजग; वास्तविकता मौन…।

कतरा-कतरा जीवन की डोर सिमटती जाती है संध्या के लाल गर्भ में… बेख़ौफ नाचती आहिस्ते से घटती जाती है सांसों में… दौड़ अंधी, भाग दुनियाँ की बैचैन चेहरों में उगती है मायूस पल तृष्णा की कैद आजाद मन पर चढ़ती जाती है…। सभी भाग रहे बस औरों से आगे-आगे, किस ओर कहा
 
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महात्मा…Gandhi...।

हमारे परम पिता, गुरु एवं कर्णधार कई मायनों में हमसे बिल्कुल समान और थोड़े जुदा-जुदा भी। आज विश्व अहिंसा दिन भी घोषित किया गया जो इस महान पुरुष के लिए विश्व श्रद्धांजलि है। भारत ही ऐसा देश है जहाँ इस महा- पुरुष की सबसे ज्यादा आलोचना की गई मगर वह आज भी
 
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