"दिनकर"… एक बलंद आवाज ।
बढ़कर विपत्तियों पर छा जा, मेरे किशोर! मेरे ताजा! जीवन का रस छन जाने दे,तन को पत्थर बन जाने दे। तू स्वयं तेज भयकारी है, क्या कर सकती चिनगारी है?" राष्ट्रकवि 'दिनकर' विरचित ये पंक्तियाँ आम मानव में भी विशिष्टता का बोध कराने सकने में सक्षम है… विगत कुछ
Dec 29 2009 11:46 AM



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