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चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना कभी अलविदा नाम कहना

अदभुत , अविस्मरनीय , अलौकिक , .. उत्सव के समापन की घोषणा किस तरह हो, यहाँ अदा जी का अनुरोध भी हमें रोक रहा है... (चलते चलते मेरे ये गीत)मनुहार भरे स्वर में अपराजिता का आग्रह उत्सव की शोभा बढ़ाते हुए रुकने को विवश कर रहा है(ये लम्हा फिलहाल जी लेने दे)पुन:
 
रवीन्द्र प्रभात
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बाजे अलख बधाई अवध में बाजे अलख बधाई

बिहार का ज़िक्र तो हर जगह होता है, तो यहाँ भी आया है बिहार ......... बिहार की थाप लिए खडी हैं मधुबाला जी अपने समूह के साथ , रोक नहीं पायेंगे आप खुद को , गा उठेंगे उनके साथ....( बाजे अवध ....)
 
रवीन्द्र प्रभात
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केवल तुम हो ...तुम

तुमअपरिचित थेबुरे नहींभले लगे थेकिन्तुह्रदय में एक भीबुलबुला नहीं फूटाकिदृष्टि उठा कर तुम्हे देख लूंतबना जाने कौन सीकिरण की इंगिततुम्हे मेरे करीबखींच रही थीमेरी पीर से तुम मेंपीर जगा रही थीअबना जाने कौन सी रासतुम्हे खींचती हुईमेरे इतने करीब ले आई हैकि
 
वाणी गीत
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ये बेचारे (??) पति

ये बेचारे पति ....इनको समझने के लिए खुशदीप जी के दस commandents की कोई आवश्यकता नहीं ...दरअसल इन्हें समझने की ही जरुरत कहाँ पड़ती है ...फिर भी शिखा वार्ष्णेय ने अपनी पोस्ट में परिभाषित करने की कोशिश की थी ...मगर हरी अनंत... हरी कथा अनंता की तरह पतियों की
 
वाणी गीत
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रोक सको तो रोक लो: - महफूज़

अभी थोड़े दिन पहले कि ही बात है. मैं जिम से एक्सरसाइज़ कर के अपने दोस्त पंकज के साथ घर लौट रहा था. कडाके कि ठण्ड में भी मुझे बहुत गर्मी लग रही थी. उस दिन कार्डियो और बेंच प्रेस बहुत ज्यादा कर लिया था. मुझे बॉडी बिल्डिंग का बहुत शौक़ है, मैं आज भी दो
 
महफूज़ अली
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कहाँ जा रही हो हिंदी ???

ब्लॉग जगत में हिंदी और देवनागरी लिपि अपने कंप्यूटर पर साक्षात् देखकर जो ख़ुशी होती है, जो सुख मिलता है, जो गौरव प्राप्त होता है यह बताना असंभव है, अंतरजाल ने हिंदी की गरिमा में चार चाँद लगाये हैं, लोग लिख रहे हैं और दिल खोल कर लिख रहे हैं, ऐसा प्रतीत
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निःसंदेह दम तोड़ देगी हमारी गरिमा.....

आज कल हर किसी की जुबां से एक शब्द आम सुनाई पड़ता है  Comfort ', अक्सर महिलायें  ये कहती सुनी जाती हैं...मैं साड़ी में comfortable   नहीं फील करती हूँ....साड़ी पहनना मुसीबत है ...बड़ा काम हो जाता है...इत्यादि....आज कल साड़ी को
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मैं झूठ नहीं बोलता: महफूज़

मैं झूठ नहीं बोलता,साहित्य-कला से क्या लेना?ढूंढ रहा खुद को मैं,खोज रहा प्याज़,छिलकों में.....
 
महफूज़ अली
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अदा के लिये

सांसे जब तक धडकती रहे,नब्जो मे हो जब तक स्पन्दन,तुमको कलम और आवाजो कोथामना ही होगा.कैसे तुम कह सकती होशव्दो को अलविदा.संजीव तिवारी......
 
संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari
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मेरी जंग: वक़्त का सबसे बड़ा झूठ...

जब मैं खोया हुआ रहता हूँ, एकटक छत को घूरता रहता हूँ अपने आसपास से अनजान और काटता रहता हूँ दांतों से नाखून. नहीं सुनाई देती है कोई भी आवाज़ कोई मुझे थक हारकर झिंझोड़ता है और पूछता है क्यूँ क्या हुआ? मेरे मुहँ से अचानक निकलता है नहीं......!!!! कुछ भी त
 
महफूज़ अली
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कहा था तुमने की कभी बुझना नहीं.....मैं लगातार जल रहा हूँ॥

कहा था तुमने की कभी रुकना नहीं और  मैं लगातार चल रहा हूँ॥ ज़मीन क्या ,  आस्मां पे भी मेरे पैरों के निशाँ हैं..... मेरी हदें मुझे पहचानतीं हैं, और  मैंने वीरान हुए रास्तों को भी आबाद किया है॥ शांत हो के मैं ठहर जाऊँ  यह असंभव
 
महफूज़ अली
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मुझे हर पल ज़रुरत है तुम्हारी, मत छोड़ो साथ मेरा कि आँसू भी साथ न निभा पायें .....

अहसास साथ हैं, हर पल हर वक्त पर ऐसा लगता है की खोया हुआ सा है कुछ। नही हो तुम मेरी कल्पना हो तुम मेरा यथार्थ ख़ुद राह मैं तलाशूंगा जब तुम दोगी मेरा साथ। मुझे हर पल ज़रुरत है तुम्हारी, जलते रहने के लिए, धड़कते रहने के लिए, मत आओ एक हवा के झोंके की तरह
 
महफूज़ अली
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सादगी भी एक अदा ठहरी

भई, अपनी तो सरकार वही जो अदा रखती हो। सादगी के हो-हल्ले में लगा कि ये बेनाज-बेअदा बला कहां से आयी! अब मुतमइन हुए कि अरे यह सादगी भी एक अदा ही ठहरी। आज के खुल्लम-खुल्ला खुलेपन में लाज की गठरी बनी न जाने कहां सिमटी-सिकुड़ी बैठी थी। उसे उठाकर सरेबाजार फिर
 
अभिनव उपाध्याय
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फोटोग्राफर को छकाया, फोटो देखकर मज़ा आया

जिस दिन मेरा छमाही बर्थडे था, उस दिन आपको बताया था ना कि मैं 'फोटो-स्‍टूडियो' गया था । और किस तरह मैंने फोटोग्राफर रवि अंकल को तंग किया था । आखिरकार मेरी तस्‍वीरें आ गयी हैं । यहां चढ़ाने में ज़रा देर हो गयी । लेकिन मैं आपको ये तस्‍वीरें दिखाने के लिए
 
जादू.... jaadoo
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कर पग गहि अंगूठा मुख मेलत

पता है आजकल मैं नये-नये करतब करने लगा हूं । पहले मैं सिर्फ अंगूठा चूसता था अपने हाथ का अंगूठा । लेकिन उसके बाद हुआ ये कि मैंने कोशिशें कीं और अब दोनों पैरों के अंगूठे मेरी गिरफ्त में आ गये हैं । आजकल मम्‍मी का काम बहुत बढ़ गया है । पहले वो मेरे हाथ
 
जादू.... jaadoo
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समीर अंकल को मिला ईनाम : डॉक्‍टर मामा से और मेरी तरफ से 'हैपी-बड्डे'

दो दिनों से मैं अपना ब्‍लॉग नहीं लिख पाया । फिर आज ही प्रशांत चाचू का चेन्‍नई से कमेन्‍ट आया : अरे दो दिन हो गए और जादू-बेटा का अता-पता नहीं है । कहां हैं जादू जी । इसलिए मैंने सोचा कि अब तो बताना ही पड़ेगा सबको । पता है परसों मेरी मम्‍मी का गला ख़राब हो
 
जादू.... jaadoo
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