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धर्म की नितांत दार्शनिक व्याख्या क्यूं।

अजीत कुमारधर्म को लेकर अपने अपने समय में दार्शनिकों की घोषणाएं चाहे जो भी रही हो। व्यवहारिकता के धरातल पर धर्म की अपरिहार्यता समाज में पहले भी थी और आगे भी रहेगी। ईश्वर को मृत मानने की नीत्शे की घोषणा से लेकर विचार और इतिहास के अंत तक की कई घोषणाएं की जा
 
संदीप पाण्डेय
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विरोध ही बदलाव का मूल है...

अजीत कुमारव्यावसायिक सिनेमा और मीडिया, पापुलर कल्चर की वह सबसे पापुलर विधा है जिससे आप विचार या विरोध् के बुनाव या विस्तार की उम्मीद नहीं कर सकते। उल्टे खंडित सच के नाम पर यह विरोध्, संगठन, जनपक्षधरता और आंदोलन का लगातार माखौल उडाने में लगा है। आज की
 
संदीप पाण्डेय
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ज्योति बाबू की राजनीतिक स्वीकार्यता अप्रतिम थी

अजीत कुमार अपने पिछले संक्षिप्त आलेख में मेरा मकसद यह कहना था कि एक राजनेता की राजनीतिक उपलब्धि सत्ता में हिस्सेदारी पर भी बहुत कुछ तय होती है। लेकिन सत्ता के सहारे हासिल राजनीतिक उपलब्धि ज्यादातर मौकों पर सिद्वांत, विचारधारा और विकास को लेकर घोर
 
संदीप पाण्डेय
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अबू आजमी को ढाल मत बनाओ

आज प्रभाष जी नहीं हैं, न कागद कारे जैसा स्तंभ है। उनके रहते हुए लगा ही नहीं कि लिखूं , क्योंकि उन्हें पढकर लगता था मेरी सारी बातें उन्होंने लिख दी हैं. आज उनके नहीं होने के बाद अपन अंदर की बात कहीं पढने को नहीं है सो खुद ही लिखने को मजबूर हूं। अजीत क
 
संदीप पाण्डेय