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ब्लॉगर की राय पर ध्यान दिया ह्वाइट हाउस ने !

ब्लॉगरों की दुनिया को शायद उतनी गम्भीरता से नहीं लिया जाता जितनी गम्भीरता से लिया जा सकता है। दरअसल बात ब्लॉगरों की नहीं। सीमित संख्या के विशेषज्ञों की है। प्रायः हर मसले पर उनकी ही राय महत्वपूर्ण होती है। ब्लॉगिंग ने राय को दूर तक फैलाने का काम किया है।
 
प्रमोद जोशी
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पेज 3 वाले अखबार का चिंतन

करीब डेढ़ दशक पहले टाइम्स ऑफ इंडिया ने पेज3 पत्रकारिता शुरू की थी। उद्देश्य एक नए बाज़ार को गढ़ना और उसका फायदा उठाना था। देखते ही देखते सारे अखबारों ने उसकी नकल शुरू कर दी। यहाँ तक कि हिन्दी अखबारों ने, जिनके पाठक पार्टी-कल्चर को समझते नहीं थे, पार्टी
 
प्रमोद जोशी
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मौसम बड़ा बेइमान है (व्यंग्य/कार्टून)

लीजिये साहब बरसात आ गई । अब की बार वक्त पर आ गई । अखबार वाले कह रहे थे कि पिछली बार तो बेवक्त भी नहीं आई थी । आनी भी चाहिये अगर सर्दी, बसंत और गर्मी, ठीक वक्त पर आ सकते हैं तो बरसात को भी टाईम का पाबंद होना चाहिये । पाबंदी जरूरी [...]
 
K M Mishra
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जादू का संडे-स्‍पेशल मौज-मस्‍ती बुलेटिन

  संडे को अमूमन पापा घर पर होते हैं। यानी ये दिन होता है मौज-मस्‍ती करने का। सबेरे सोकर उठा तो पापा ने कहा चलो सैर करके आते हैं। फिर हम गए गोराई-क्रीक। जहां समुद्र के उस तरफ गोराई-विलेज से महिलाएं ताज़ा पत्‍तेदार सब्जियां लेकर आती हैं। मैंने पापा से
 
जादू.... jaadoo
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मूल प्रश्न यह है कि हथियार आते कहां से हैं-हिन्दी लेख

दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़ में सुरक्षा कर्मियों की हत्या परे भारत के लोगों को जितना क्षोभ हुआ है उसका अंदाजा देश के बुद्धिजीवी और संगठित प्रचार माध्यम नहीं लगा पा रहे। कभी कभी तो इस लेखक को लगता है कि अपना दिमाग ही चल गया है या फिर देश के कथित बुद्धिजीवियों और
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टाइम्स ऑफ़ इंडिया की पत्रकारिता का मुलाहिज़ा फरमाइए!

मीडिया में गला काट प्रतिस्पर्धा का इससे प्रत्यक्ष उदाहरण और क्या मिलेगा! जैसा कि आप देख सकते हैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने माइक से 'जैन टी वी' का लोगो गायब कर दिया। टाइम्स नाउ और जैन टी वी का भला क्या मुकाबला है लेकिन फिर भी, दूसरे चैनल का नाम भी क्यूँ
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वन्य जीव संरक्षण व इतिहास का नया न्यूज पोर्टल- दुधवा लाइव

भारत की जैव-विविधिता के अध्ययन व संरक्षण के लिए दुधवा लाइव न्यूज पोर्टल http://www.dudhwalive.com की शुरूवात हो रही है। जहाँ आप सभी उन्मुक्त विचारों की नितान्त आवश्यकता है। यह पोर्टल वन्य-जीवन, ग्रामीण अंचल, पशु-क्रूरता, औषधीय वनस्पति, पारंपरिक ज्ञान,
 
Krishna Kumar Mishra
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अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं।

-कृष्ण कुमार मिश्र अफ़सोस की हमारे लोगों की उंगलियों के निशान ही गायब हैं। गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के लिए- राष्ट्रीय बीमा योजना। (श्रम एंव नियोजन मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार एंव आई सी आई लोम्बार्ड द्वारा) भारत की एक बड़ी आबादी जो अपनी उंगलियों के
 
Krishna Kumar Mishra
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क्या हिन्दी अवधी को खा गयी!

क्या अवधी को हिन्दी खा गयी! अफ़सोस इस बात का है कि हिन्दी उत्तर भारत की तमाम बोलियों को खा तो गयी किन्तु हिन्दी हिन्दवी नही बन पायी। यह वाक्य शायद तमाम लोगों को अजीब लगे, पर यह मसला बहस का है। एक समय था जब ब्रज काव्य की भाषा के तौर पर भारत की तमाम [...]
 
Krishna Kumar Mishra
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सच्चे समाजवादी थे अवधी सम्राट

क्यों न हम पं० बंशीधर शुक्ल जी के जन्म-दिवस को विश्व अवधी दिवस के रूप में मनायें। वो विधायक थे, स्वंतत्रा संग्राम सेनानी थे और हिन्दी अवधी के मर्मग्य, लेकिन फ़िर भी वो जननायक नही थे और न ही नेता, असल में सच्चे हितैषी थे उन सभी प्रजातियों के जो इस धरती पर
 
Krishna Kumar Mishra
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ब्लॉग जगत एक सम्पूर्ण पत्रिका है या चटपटी ख़बरों वाला अखबार या महज एक सोशल नेटवर्किंग साईट ?

जब पहली बार ब्लॉग जगत से नाता जुड़ा तो ऐसा लगा जैसे पुरानी पत्रिकाओं की दुनिया में आ गयी हूँ.सब कुछ था यहाँ,कविताएं,कहानियां,गंभीर लेख,सामयिक लेख,खेल ,बच्चों और नारी से जुडी बातें. पर कुछ दिन बाद ऐसा लगने लगा..कि यह उच्चकोटि की एक सम्पूर्ण पत्रिका है या
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सूरज मकर हवाई अड्डे पर पहुंचा!

……..मकर संक्रान्ति पर आप सभी को शुभकामनायें, आखिर सूरज तमाम झंझावातों के बावजूद अपनी मंजिल तक पहुंच गया, यानी मकर राशि के स्टेशन पर, ..वैसे उसने बड़ी तकलीफ़े झेली, खराब मौसम, नो विजिबिलिटी, पतवार खो गयी थी, नाव डगमगाई थी, पटरी से गाड़ी भी एक बार
 
Krishna Kumar Mishra
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संपादक का अक्षर ज्ञान...!

अशोक कुमार ने प्रभात खबर, पटना (11।10।2009) को ‘ आपकी कलम‘ में प्रकाशनार्थ एक पत्र लिखा जिसे 16।10।2009 को प्रकाशित किया गया। लेकिन ‘संपादन-कौशल’ या कि अज्ञान ने उल्टी गंगा बहा दी। आपके समक्ष मूल पत्र एवं प्रकाशित पत्र हू-ब-हू रखे जा रहे हैं, ताकि अखबार
 
राजू रंजन
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हिंदुस्तान अखबार द्वारा पत्रकारों के शोषण की मुहिम का विरोध करें

हिंदुस्तान टाइम्स समूह के दैनिक अखबार हिंदुस्तान में इन दिनों पत्रकारों से एक एग्रीमेंट पर ज़ोर-ज़बरदस्ती से हस्ताक्षर कराया जा रहा है जिसमें कहा गया है कि उनका मुख्य कार्य पत्रकारिता नहीं है बल्कि वे शौकिया अखबार को कुछ समाचार या रिपोर्ट देते हैं जिनक
 
Ek ziddi dhun
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रेग्युलर करियर ऑप्शन बन रहा है शेयर कारोबार

जॉब का ब्यौरा : हफ्ते में पांच दिन ड्यूटी। रोज करीब छह घंटे तक कंप्यूटर से मिल रही सूचना पर फैसला लेना। टेबल पर हाथ पटक कर खुशी और गम जताने के अलावा कोई शारीरिक मेहनत नहीं।   क्वॉलिफिकेशन: ठीकठाक पूंजी हो। हिसाब-किताब रखना अच्छी तरह आए। कंप्यूटर
 
रमेश तिवारी
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अपना नाम बदल दूंगा - विज्ञापन देकर

विज्ञापन भी न जाने कैसे कैसे होते हैं ? विज्ञापन शब्द सुनते ही मुझे अखबार का वर्गीकृत विज्ञापन याद आ जाता है । मैं हमेशा ही उस पेज को देर तक देखता हूँ । क्योंकि वही एक पन्ना होता है जहां आपको फ्री हंसी मिलती है ।कहीं पार्ट टाइम जाब के लिए मिलते हैं हर
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हिन्दी दिवस और बेजुबान जानवर

कल हिन्दी दिवस था और विदा भी हो गया मामला जस का तस, अब पूछियें कि हिन्दी दिवस और बेजुबान जानवर में क्य संबध है ? बताता हूं । हमारी तमाम बोलियां, लिपियां, दुनियां में हमें भाषायी मामलें में सबसे धनी बनाती है पर क्या धनी होने का खिताब हमें मिला नही हां ऊपर
 
Krishna Kumar Mishra
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बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

स्वाधीनता दिवस पर मन उदास है या बेचैन कह पाना बड़ा ही मुश्किल है । ख्याल आ रहा है कि राष्ट्रीय त्यौहार के मौके पर मन में उत्साह की गैर मौजूदगी कहीं नकारात्मकता और निरुत्साह का संकेत तो नहीं । सड़क पर सैकड़ों चौपहिया वाहनों की रैली में "सरफ़रोशी की तमन्ना
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‘सच का सामना’ वह ख्याल से कर रहे होते-हास्य व्यंग्य और कवितायें (sach se samana-hindi vyangya aur kavitaen)

ख्याल कभी सच नहीं होते आदमी की सोच में बसते ढेर सारे पर ख्याल कभी असल नहीं होते। कत्ल का ख्याल आता है कई बार दिल में पर सोचने वाले सभी कातिल नहीं होते। धोखे देने के इरादे सभी करते पर सभी धोखेबाज नहीं होते। हैरानी है इस बात की कत्ल और धोखे के ख्याल भी
 
दीपक भारतदीप
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या इलाही ये माजरा क्या है ............

गणेश शंकर विद्यार्थी , माखनलाल चतुर्वेदी जैसे पत्रकारों ने कलम की खातिर नैतिकता के नए नए प्रतिमान स्थापित किए । खींचों ना तलवार ना कमान निकालो जब तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो । संभवतः ऎसा ही कोई शेर है ,जो पत्रकारों को नैतिकता के साथ व्यवस्था के गु
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