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डा श्याम गुप्त की गज़ल..

गज़लउनके अश्कों को पलकों से चुरा लाये हैं ।उनके गम को हम खुशियों से सजा आये हैं ।आप मानें या न मानें ये तहरीर मेरी,उनके अशआर ही गज़लों में उठा लाये हैं।उस दिये ने ही जला डाला आशियां मेरा,जिसको बेदर्द हवाओं से बचा लाये हैं ।याद करने से तो दीदार न होता
 
Dr. shyam gupta
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डा श्याम गुप्ता की ग़ज़ल---

ग़ज़ललिख दिया दिल पे अपने नाम तुम्हारा यारा |गुल से भी नाज़ुक है ये दिल हमारा यारा |आप यूं तोड़कर इसको न जाइयेगा कभी,अक्स बसता है इसमें तो तुम्हारा यारा |रुक न पायेंगे कदम अब तो किसी भी दर पे,झुक के सज़दे में ये दिल तुझे हारा यारा |तेरे कदमों में अब यार
 
Dr. shyam gupta
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जी तो चाहा था मुस्कराने को!

आखरी टीस आजमाने को, जी तो चाहा था मुस्कराने को। कितने मजबूर हो गये होंगे, अनकही बा मुंह पे लाने को। खुल के हंसना तो सबको आता है, लोग तरसे है इक बहाने को। हाथ काँटों से कर लिए जख्मी, फूल बालो में इक सजाने को। आस की बात हो की साँस 'अदा', ये खिलोने थे ट
 
पिंटू कुमार
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