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डा श्याम गुप्त की गज़ल..
गज़लउनके अश्कों को पलकों से चुरा लाये हैं ।उनके गम को हम खुशियों से सजा आये हैं ।आप मानें या न मानें ये तहरीर मेरी,उनके अशआर ही गज़लों में उठा लाये हैं।उस दिये ने ही जला डाला आशियां मेरा,जिसको बेदर्द हवाओं से बचा लाये हैं ।याद करने से तो दीदार न होता
May 02 2010 06:16 PM



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