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ये प्यार नहीं है।

किसी खूबसूरत परों वाली चिड़िया कोचुगाओ हीरे के दाने,पिलाओ झरनों का पानी,उसके लिये बनाओ,सोने का एक विशाल महल,जड़ो,शीशे के दरवाजे खड़कियाँसजाओ उसमें,जन्नत के फूल, कलियाँ, हरियाली।और उसके उड़ने के लिये आसमानतुम करो निर्धारित ये प्यार नहीं है।
 
कंचन सिंह चौहान
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“वरिष्ठ गणतन्त्र-दिवस” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आज हमने मनाया इकसठवाँ गणतन्त्र फूँक दिया जन-मानस में वरिष्ठता का मन्त्र यह तन्त्र हो गयालेवा निवृत्त बाहर कर दिया परिधि से वृत्त नही कह पा रहे खुलकर शब्द हो रहे मौन हैं क्योंकि आज बुजुर्ग कीमानता ही कौन है??
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“तब और अब” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

(श्रीमती रजनी माहर) तब ऱुपये किलो था आटा, अब है कितना घाटा, नानी संग जाती बाजार, नौ रुपये किलो था अनार, एक रुपये में दो किलो ज्वार, गेहूँ चावल की भरमार, कम मिलती थी बहुत पगार, कभी न होते थे बीमार, तन चुस्त थे मन दुरुस्त थे, थोड़े में सब लोग मस्त थे,
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“बूढ़ा हो रहा बचपन है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कुहासे की सफेद चादर मौसम ने ओढ़ ली ठिठुरन से मित्रता भास्कर ने जोड़़ ली निर्धनता खोज रही है आग के अलाव किन्तु लकड़ियों के ऊँचे हैं भाव ठण्ड से काँप रहा है कोमल तन कूड़े में से पन्नियाँ बीन रहा है बचपन इसके बाद वो इन्हें बाजार में बेचेगा फिर जंगल में जाकर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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“विदेश-यात्रा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आज अचानक बन गया एक संयोग घर में आ गये कुछ परिचित लोग विदेश-यात्रा का बन गया कार्यक्रम कार में बैठ गये उनके साथ हम कुछ रुपये जेब में लिए डाल आनन-फानन में पहुँच गये नेपाल सामने दिखाई दिया एक शहर नाम था उसका महेन्द्रनगर वहाँ बहुत थे आलीशान मकान एक खोके में
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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"मेरे देश के नेता! सचमुच महान हैं!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रोटी है,  बेटी है,  बँगला है,  खेती है, सभी जगह  घोटाले हैं,  कपड़े उजले हैं, दिल काले हैं, उनके भइया हैं, इनके साले हैं, जाल में फँस रहे,  कबूतर भोले-भाले हैं, गुण से विहीन हैं अवगुण की खान हैं जेबों में रहते इनके भगवान
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक