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चाँद खिलौना तकते थे

चाँद खिलौना तकते थे। जब यारों हम बच्चे थे। रिश्तों में इक बंदिश है, हम आवारा अच्छे थे। डांठ नही माँ की भूले, जब बारिश में भीगे थे। कुछ नए शेर जोड़ रहा हूँ.................................... पास अभी भी हैं मेरे, तुने ख़त जो लिक्खे थे। ठोकर खा के जाना
 
अंकित "सफ़र"
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बात करेगा मुद्दे की, पेड़ पका जो इक फल है।

आजकल ज़्यादा वक्त नही मिल पा रहा है, ऍम.बी.ऐ के आखिरी दौर में हूँ(मतलब प्लेसमेंट्स)। एक कोशिश की है कुछ ख्याल आ गए थे और फ़िर कलम रुकी नही....................... जिद में उसकी बादल है। बचपन कितना पागल है। . डूबेगा जो उतरेगा, ख्वाहिश ऐसा दलदल है। . मैं
 
अंकित "सफ़र"
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खेल गली के भूल गए सब...............

राजस्थान में एक महीने की ट्रेनिंग के बाद कुछ ही वक़्त बिताया मुंबई में और फिर आ गया उत्तर प्रदेश में, वैसे आजकल लखनऊ में डेरा जमाया हुआ है और यहीं पर बना रहेगा ९ सितम्बर तक. वीनस जी ने पूछा था की इलाहाबाद कब आना हो रहा है? वीनस जी इस बार तो मौका नहीं मिल
 
अंकित "सफ़र"