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आँखों पर जोर डालो तो रास्ता दिखेगा...

आँखों पर जोर डालो तो रास्ता दिखेगा जितना वहम है कोहरा उतना घना नही होगा |सैंतालिस में फरमान जारी कर बैठे थे हर जन को आजादी का अहसास हुआ होगा |आज भी भुखमरी पर बहस जारी थी होंठो पर हंसी, हाथों में जाम भी होगा |उजली खादी की फिर जमघट सजी
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ज़माना बदल गया...

एक दिन पार्क में बैठा मै किसी सोच में डूबा था| तभी वहाँ कुछ रोचक प्रसंग दिखाई पड़ा, जिसे मैंने कागज पर उतार कर उस तीर से एक और निशाना साधने की कोशिश की| जिसे मै और अच्छा कर सकता हूँ, लेकिन दिमाग के थके होने और जल्दबाजी के कारण जैसे बन पड़ी आपके सामने
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"तोहफा..."

ये रचना मैंने अपने लखनऊ विश्वविद्यालय में दोस्तों के मस्ती के साथ बीती जिंदगी के दौरान लिखी थी, जो डायरी के पन्नो में नीचे दबी पड़ी थी। आज जब नजरो के सामने मिली तो उन्ही एहसासो को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर दिया.......वो बचपन के छूटे हुए पलवो हंसते हुए गुजरा
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"मीत बना मै घूम रहा हूँ..."

अपनी पी.जी. पूरी करके पढाई के कारण लखनऊ छोड़ने के बाद एक दिन मधुशाला पढ़ते हुए, तनहाइयों में बच्चन जी की साकी, प्याला, हाला और मधुशाला को अपनी भावनाओ में डाला तो ये रचना बन पड़ी थी..... जिसे मै अपने डायरी के पन्नो से निकालकर आपके सामने प्रस्तुत कर रहा
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"मासूम शाम आ गई..."

कई दिनों से यहाँ मै लिखने से दूर रहा। इस बीच मैंने कुछ लिखा भी तो उसे यहाँ लिखने का मन नही हो पाया और कुछ व्यस्तता ऐसी रही की यहाँ से दूरी भी बनी रही। एक बार फ़िर आप लोगो से उस दूरी को हटाते हुए, मै यहाँ अपनी कुछ भावनाओं को कुछ पंक्तियों के माध्यम से
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"यादों की इक रेल चली..."

बस ऐसे ही एकांत में बैठा था मै की अन्तरमन कुछ पाने को व्यग्र सा हो रहा था। मैंने उसी समय अपनी कलम उठा ली और भावनाओ को एक पन्ने पर दर्ज कर दिया............. उसी एहसास की बातें अब आप लोगों के सामने यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.............यादों की इक रेल चली
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"तनहाई..."

लिखा मैंने इसे काफी पहले था लेकिन आज फ़िर से इसे आप सब के सम्मुख पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये रचना तब आई थी जब हम सब मित्र लखनऊ विश्वविद्यालय की जिंदगी में मस्त थे। और देर रात फ़िल्म देख कर और मस्ती करके जब मै अपने कमरे पर आया तो इकदम अकेला था, तब ही जो
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"जब भी ये मन उदास होता है..."

इस रचना को मैंने कुछ दिन पहले लिखा था। परन्तु कुछ कारणों वश उसे तब नही दे पाया था। इसे मैंने तब लिखा था, जब किसी अपने के कारण मुझे कुछ दुःख पहुँचा था और इत्तेफाक देखिये उस बार फ़िर मै अकेला ही था। उसी समय जो भावनाएं निकली उन्हें पन्ने पर दर्ज कर दिया और