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"जिंदा मुर्दे"

उसे लगता था, दुनिया है मुर्दों की, यहाँ बस मुर्दें ही सांस लेते हैं, पिघला के रूहें, बना के नश्तर  उनसे,जान लेते हैं, खून पीते हैं, वो इक ज़माने तक बना रहा इंसान, जीने की हसरत में रोज़ मरता था, हुआ इंसानियत से
 
Yogesh Sharma