शुक्र है, उनके हाथ में पिस्तौल नहीं था!!
सर्दियों की रात थी, मैं करीब आठ बजे अपनी मोटर-साईकिल से शक्तिनगर चौक से गुजर रहा था। मुझे एक जरूरी फोन करना था और मेरे पास मोबाइल नहीं था इसलिए मैं एक टेलीफोन-बूथ के सामने रूका। हैलमेट उतार ही रहा था कि संभ्रांत घरों के कुछ लड़के आसपास से दौड़त...
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जितेन्द़ भगत
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[04 Nov 2008 23:02 PM]



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