वर्षा-दिनः एक ऑफ़िस

दिल के दरमियाँ PRESENTS जलती-बुझती रही दिवस के ऑफ़िस में बिज़ली। वर्षा थी, यों अपने घर से धूप नहीं निकली। सुबह-सुबह आवारा बादल गोली दाग़ गया सूरज का चपरासी डरकर घर को भाग गया गीले मेज़पोश वाली- भू-मेज़ रही इकली। वर्षा थी, यूँ अपने घर से धूप नहीं निकली। आज न आई आशुलेखिका कोई... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ० कुअँर बेचैन
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[23 Oct 2008 04:57 AM]

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