गोरी धूप चढ़ी
रात) जाते-जाते दिवस, रात की पुस्तक खोल गया। रात कि जिस पर सुबह-शाम की स्वर्णिम ज़िल्द चढ़ी गगन-ज्योतिषी ने तारों की भाषा ख़ूब पढ़ी आया तिमिर, शून्य के घट में स्याही घोल गया। (सुबह) देख भोर को नभ-आनन पर छाई फिर लाली पेड़ों पर बैठे पत्ते फिर बजा उठे ताल...
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डॉ० कुअँर बेचैन
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[20 Oct 2008 03:26 AM]



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