शाम
संध्या के केशों में बँध गया 'रिबन' -सूरज की लाली का। हँसुली-सा इंद्रघनुष बिंदिया-सा सूर्य मेघों की माला में ज्योतित वैदूर्य्य सतरंगे वेशों में बस गया बदन -फूलभरी डाली का। कुंडल-से झूम रहे क्षितिजों पर वृंत चूम रहा अधरों को मधुऋतु का कंत तन-मन के देशो...
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डॉ० कुअँर बेचैन
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[13 Oct 2008 04:49 AM]



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