जैसे सांस
धूप के कटोरे में पड़ी पानी की बूंदें भाप बन जाती हैं जैसे हवा बन जाते हैं मेरे शहर के लोग शहर एक बुरी हवा था मुहल्ले-पाड़े जैसे आंच के थपेड़े बुख़ार के फेफड़ों से निकली उसांसें थीं गलियां इन गलियों में जीवाणुओं की तरह रहते थे लोग जिनकी आबादी का पता द...
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Geet Chaturvedi
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[08 Oct 2008 02:05 AM]



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