बोलना चाहता हूँ प्रतिबंधित कर दिया जाता हूँ
इधर इतना कुछ टूटा, इतना बिखरा कि सँभालते- सँभालते .बार-बार इक शे' र जेहन में आता रहा : हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता जिस इलाके में रहता हूँ, इसे ही ख़ास मानसिकता में पल्लवित पत्रकार आतंकवादियों का अड्ड...
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शहरोज़
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[04 Oct 2008 10:55 AM]



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