मन की माटी
उर्वर ज़मीन....जिसकी कोख में कितने ही बीज निंद्रा में डूबे हुए । नमी की बरसात में...प्यार पला ...नये बीज हवा में चले आये ,सोये बीज आँख मल कर उठे...अंकुर फूटे.....नये कोंपल....। गीली मिट्टी में नन्हे जड़ो ने पाँव रखे... बात बनी, भाव बने, याद बनी, साथ...
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Beji
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[24 Sep 2008 14:29 PM]



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