वारी जाउं रे, बलिहारी जाउं रे....

नदिया बहती जाए नदी इस बार पहुंची मरु प्रदेश में. सूखी-तपती रेत और वैसी ही रेत उड़ाती हवा. जाने कौन-सी बेचैनी है इस हवा में.... इन्हीं रेत लहरियों में कहीं गूंजती है कोई संगीत लहरी और हवा रुक जाती है. एकदम चुप. जैसे साक्षी भाव से पहर-दो पहर ठहर कर इन संगीत लहरियों क... [पूरी पोस्ट]
writer Geetashree
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[23 Sep 2008 05:57 AM]

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