इमरे कर्तेश की दुनिया से बाहर

वैतागवाड़ी कहते हैं कि इमरे कर्तेश को पढ़ने के तुरंत बाद वैसे भी कुछ करने का मन नहीं करता. एक अजीब कि़स्म का अवसाद, घुटने मोड़कर बैठी हुई चुप्पी, हथौड़े की तरह पूरे वजूद पर आ गिरा अकेलापन, अपने होने पर सकुचाता कोई लजीला संवाद, अचानक चीख़ में बदल गई कोई कराह और... [पूरी पोस्ट]
writer Geet Chaturvedi
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[18 Sep 2008 07:17 AM]

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