कुछ तो बोलो...

सफर - राजीव रंजन प्रसाद अधकाच्ची अधपक्की भाषा कैसी भी हो कुछ तो बोलो.. खामोशी की भाषा में कुछ बातें ठहरी रह जाती हैं आँखों के भीतर गुमसुम हो गहरी गहरी रह जाती हैं मैं कब कहता हूँ मेरे जीवन में उपवन बन जाओ मैं कब कहता हूँ तुम मेरे सपनों का सच बन ही जाओ? लेकिन अपने मन के भीतर... [पूरी पोस्ट]
writer राजीव रंजन प्रसाद
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[17 Sep 2008 22:35 PM]

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