उस त्वेष का यौवन
निर्झर धारा की हर बूँद पर आच्छादित उदयाचल का पिघला सोना अपनी प्रभा पर स्वयं इठलाता प्रवाह में निज वेग के उमंग संग इतराता बलखाता शशि का सौजन्य झुठलाता किरण की फुनगी पर बैठ मधु-पर्क चख कर फिर नीचे,नग को ध्यान में लीन निहार रहा है ,मान रहा है निज को अज्...
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swati
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[17 Sep 2008 14:03 PM]



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